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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 689, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 689

६७० नारदीयपुराणम् दीपज्वाला समा सिद्धयै वक्रा नाशविधायिनी । शब्दा भयदा कर्तुरुज्ज्वला सुखदा मता ॥६६॥ कृष्णा शत्रुभयोत्पत्त्यै घमंती पशुनाशिनी । कृते दीपे यदा पात्रं भग्नं दृश्येत दैवतः ॥१००॥ पक्षादर्वाक्तदा गच्छेद्यजमानो यमालयम् । वत्त्यन्तरं यदा कुर्यात्कार्यं सिद्धचेद्विलंबतः ॥१०१॥ नेत्रहीनो भवेत्कर्ता तस्मिन्दीपांतरे कृते । अशुचिस्पर्शने व्याधिर्दीपनाशे तु चौरभीः ॥१०२॥ श्वमार्जारारखुसंस्पर्शे भवेद्भूतितो भयम् । पात्रांरंभे वसुपलैः कृतो दीपोऽखिलेष्टदः ॥१०३॥ तस्माद्दीपः प्रयत्नेन रक्षणीयोंऽतरायतः । आसमाप्तेः प्रकुर्वीत ब्रह्मचर्यं च सुशयः ॥१०४॥ स्त्रीशूद्रपतितादीनां संभाषणमपि वर्जयेत् । जपेत्सहस्रं प्रत्येकं मंत्रराजं नवाक्षरम् ॥१०५॥ स्तोत्रपाठं प्रतिदिनं निशीथिन्यां विशेषतः । एकपादेन दीपाग्रे स्थित्वा यो मंत्रनायकम् ॥१०६॥ सहस्रं प्रजपेद्रात्रौ सोऽभीष्टं क्षिप्रमाप्नुयात् । समाप्य शोभनदिने संभोज्य द्विजसत्तमान् ॥१०७॥ कुंभोदकेन कर्तारमभिषिञ्चन्मनुं जपेत् । कर्ता तु दक्षिणां दद्यात्पुष्कलां तोषहेतवे ॥१०८॥ गुरौ तुष्टे वदातीष्टं कृतवीर्यसुतो नृपः । गुर्वाज्ञया स्वयं कुर्याद्यदि वा कारये द्गुरुः ॥१०६॥ दत्त्वा धनादिकं तस्मै दीपदानाय नारद । गुर्वाज्ञामन्तरा कुर्याद्यो दीपं स्वेष्टसिद्धये ॥११०॥ सिद्धिर्न जायते तस्य हानिरव पदे पदे । उत्तमं गोघृतं प्रोक्तं मध्यमं महिषीभवम् ॥१११॥ तिलतैलं तु तार्क स्यात्कनीयोऽजादिजं घृतम् । आस्यरोगे सुगंधेन दद्यात्तैलेन दीपकम् ॥११२॥ सिद्धार्थसंभवेनाथ द्विषां नाशनाय च । सहस्रेण पलैर्दीपे विहिते च न दृश्यते ॥११३॥ शब्द करने वाली ज्वाला भय देती है और उज्ज्वलवर्णा ज्वाला सुखदायिका मानी गई है। ज्वाला यदि कृष्णवर्ण की हो तो शत्रु भय होता है और भक्-भक् करने वाली ज्वाला पशुओं का नाश करती है। दीप जलाने के बाद यदि संयोग से पात्र टूटा दीख पड़े तो समझ लेना चाहिए कि एक पक्ष के भीतर ही यजमान यमालय पहुँच जाएगा। यदि दीप में दूसरी बत्ती डालनी पड़े तो कार्य विलम्ब से होगा। दीप बदलने से कर्ता अन्धा होता है। अशुचि अवस्था में दीपस्पर्श करने से रोग होता है। दीप के नष्ट हो जाने पर चोरों का भय होता है ॥९९-१०२॥ कुत्ते, बिलाड़ तथा चूहे से छू जाने पर राजभय जानना चाहिए। आठ पलपरिमित द्रव्य के पात्र बनाने से दीप संपूर्ण कामनाओं को सफल करता है। उपर्युक्त कारणों से दीप को समस्त विघ्नों से यत्न- पूर्वक बचाना चाहिए। जब तक व्रत समाप्त न हो तब तक ब्रह्मचर्यपूर्वक भूमि पर सोना चाहिए। उतने दिनों तक स्त्री, शूद्र तथा पतित व्यक्तियों से संभाषण न करे। नवाक्षर मन्त्रराज का प्रत्येक दिन सहस्र बार जप तथा स्तोत्रपाठ करना चाहिए। रात्रि में विशेषपूर्वक स्तुतिपाठ करना चाहिए। रात्रि में जो साधक दीप के आगे एक पैर पर खड़ा होकर सहस्र बार मन्त्रराज का जप करता है, उसका अभीष्ट शीघ्र सिद्ध होता है ॥१०३-१०६॥ शुभ दिन में व्रत समाप्त कर ब्राह्मण भोजन करा कर घट के जल से मन्त्रजप पुरस्सर यजमान का अभिषेक करे। यजमान गुरु के संतोषार्थ प्रचुर दक्षिणा दे। गुरु के संतुष्ट होने पर राजा कार्तवीर्य वांछित फल देते हैं। गुरु की आज्ञा लेकर स्वयं दीपदान करे। यदि गुरु से कराये तो दीपदान के लिये उन्हें धन आदि दे। नारद ! जो व्यक्ति बिना गुरु की आज्ञा लिये अपनी इष्ट-सिद्धि के निमित्त दीपदान करता है, उसे सिद्धि नहीं मिलती; अपितु पग-पग में हानि होती है। (इस कार्य के लिये) गाय का घी उत्तम और भैंस का मध्यम माना गया है। तिल का तेल तो महिषीघृत के ही बराबर है। बकरी आदि का घृत अधम कहा गया है ॥१०७- १११॥ मुखरोग को छुड़ाने के लिये सुगंधित तेल दीप में डालना चाहिए। शत्रुओं के नाश के लिये श्वेत सरसों का तेल छोड़े। सहस्र पलपरिमित द्रव्य का दीपपात्र बनाने पर भी यदि कार्य सिद्ध न हो तो तीन बार

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