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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 691, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 691

६७२ नारदीयपुराणम् सहस्रादित्यसंकाशे नानारत्नसमुज्ज्वले । भास्वद्ध्वजपताकाढ्ये तुरगायुतभूषिते ॥४॥ महासंवर्त्तकांभोधिभीमरावविराविणि । समुद्धृतमहाच्छत्रवितानितवियत्पथे ॥५॥ महारथवरे दीप्त नानायुधविराजिते । सुस्थितं विपुलोदारं सहस्रभुजमंडितम् ॥६॥ वामैर्दृढंउकोदण्डानद्दधानमपरैः शरान् । किरीटहारमुकुटकेयूरवलयांगदैः ॥७॥ मुद्रिकोदरबन्धाद्यैर्मौंजीनूपुरकादिभिः । भूषितं विविधाकल्पैर्भास्वरैः सुमहाधनैः ॥८॥ आबद्धकवचं वीरं सुप्रसन्नाननांबुजम् । धनुर्ज्यासिंहनादेन कंपयंतं जगत्त्रयम् ॥९॥ सर्वशत्रुक्षयकरं सर्वव्याधिविनाशनम् । सर्वसंपत्प्रदातारं विजयश्रीनिशेवितम् ॥१०॥ सर्वसौभाग्यदं भद्रं भक्ताभयविधायिनम् । दिव्यमाल्यानुलेपाढ्यं सर्वलक्षणसंयुतम् ॥११॥ रयनागाश्वपादातवृंदमध्यगमीश्वरम् । वरदं चक्रवर्तिनं सर्वलोकैकपालकम् ॥१२॥ समानोदितसाहस्रदिवाकरसमद्युतिम् । महायोगभवैश्वर्यकीर्त्याक्रांतजगत्त्रयम् ॥१३॥ श्रीमच्चक्रं हरेरंशादवतीर्णं महीतले । सम्यगात्माविभेदेन ध्यात्वा रक्षामुदीरयेत् ॥१४॥ अस्यांगमूर्तयः पंच पांतु मां स्फटिकोज्ज्वलाः । अग्नीशासुरवायव्यकोणेषु हृदयादिकाः ॥१५॥ सर्वतोस्त्रज्वलद्रूपा दरचर्मासिपाणयः । अव्याहतबलैश्वर्यशक्तिसामर्थ्यविग्रहाः ॥१६॥ क्षेमकरीशक्तियुतश्चौरवर्गविभञ्जनः । प्राचीं दिशं रक्षतु मे बाणबाणासनायुधः ॥१७॥

रथ पर सुखपूर्वक बैठे हैं। इस रथ की चमक सहस्र सूर्यों के समान है। अनेक प्रकार के रत्न उसमें जड़े हैं। प्रकाशमान पताका उसपर फहरा रही है। दश हजार घोड़े उसमें जुते हैं ॥३-४॥ महाप्रलय कालीन समुद्र के समान वह भयंकर शब्द करता है। उस पर तना हुआ महाच्छत्र ऐसा प्रतीत होता है कि मानो गगनपथ पर चंदवा लगा दिया गया हो। चमकते हुए अनेक अस्त्र-शस्त्रों से वह सुसज्जित है। वैसे रथ पर बैठनेवाले महा यशस्वी कार्तवीर्य की सहस्र भुजायें हैं। वे बाँयें हाथों में धनुष तथा दाहिने में बाण धारण किये हुए हैं। मुकुट, हार, केयूर, अंगद, वलय, मुद्रिका, कांची नूपुर आदि अनेक बहुमूल्यक तथा चमकदार आभूषणों से उनके अंग विभूषित हैं। उन वीर के शरीर में कवच बंधा हुआ है। उनका मुखकमल सुप्रसन्न है, वे धनुष की टंकार से तीनों लोक को कंपा रहे हैं ॥५-६॥ वे निखिल शत्रुओं का क्षय करने वाले, समस्त व्याधियों का नाश करने वाले, अखिल संपत्तियों को देने वाले, विजय लक्ष्मी का उपभोग करने वाले, सब प्रकार का सौभाग्य देने वाले, कल्याण करने वाले, भक्तों को अभयदान देने वाले, दिव्य माला तथा चन्दन से विभूषित, सर्वलक्षण- सम्पन्न, रथ, हाथी, घोड़े तथा पैदलों के बीच चलनेवाले, स्वामी, वरदायक, चक्रवर्ती, सकल लोकों के एकमात्र पालक, समान भाव से सर्वत्र उदित होनेवाले सहस्र आदित्यों के समान कान्तिमान्, महायोग द्वारा प्राप्त ऐश्वर्य तथा कीर्ति से तीनों लोक को आक्रान्त किये हुए, श्रीमानों के समूहस्वरूप और भूतल पर हरि के अंश से अवतीर्ण हैं। इस प्रकार आत्मा आदि के भेद से अच्छी तरह ध्यान कर रक्षा-पाठ करे ॥१०-१४॥ "अग्नि, ईशान, नैर्ऋत्य तथा वायव्य कोणों में स्फटिक के समान धवल वर्ण वाली और हृदया आदि नामों वाली कार्तवीर्य की पाँच मूर्तियाँ, जिनका रूप जाज्वल्यमान अस्त्र के समान है, जिनके हाथों में ढाल-तलवार विद्यमान हैं और जो अव्याहत बल, ऐश्वर्य, शक्ति तथा सामर्थ्य की साक्षात् प्रतिमा हैं, मेरी रक्षा करें। धनुष-बाण रूपी अस्त्रों से सुसज्जित, चोर समूह के नाशक तथा क्षेमकरी शक्ति से युक्त देव पूर्व दिशा में मेरो रक्षा करें। महामारी के