बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६७५ सप्तसप्ततितमोऽध्यायः शारीरे च महादुःखे मानसे च महाज्वरे । आधिव्याधिभये विघ्नज्वालोपद्रवकेऽपि च ॥५०॥ न भवेत्तु भयं किंचित्कवचेनावृतस्य मे । आगंतुकामानखिलानस्मद्वस्रुविलुंपकान् ॥५१॥ निवारयतु दोर्दण्डसहस्रेण महारथः । स्वकरोद्भूतसाहस्रपाशबद्धान्सुदुर्जयान् ॥५२॥ संरुद्धगतिसामर्थ्यान्करोतु कृतवीर्यजः । सृणिसाहस्रनिर्भिन्नान्सहस्रशरखंडितान् ॥५३॥ राजचूडामणिः क्षिप्रं करोत्वस्मद्विरोधकान् । खड्गसाहस्रदलितान्सहस्रमुसलादितान् ॥५४॥ चौरादिदुष्टसत्त्वांघान्करोतु कमलेक्षणः । स्वशंखनादसंस्त्रस्तान्सहस्रारसहस्रभृत् ॥५५॥ अवतारो हरेः साक्षात्पालयत्वखिलं मम । कार्तवीर्यं महावीर्यं सर्वदुष्टविनाशन ॥५६॥ सर्वत्र सर्वदा दुष्टचौरानाश्य नाशय । किं त्वं स्वपिषि दुष्टघ्न किं तिष्ठसि चिरायसि ॥५७॥ उत्तिष्ठ पाहि नः सर्वभयेभ्यः स्वसुतानिव । ये चौरा वसुहर्तारो विद्विषो ये च हिंसकाः ॥५८॥ साधुभीतिकरा दुष्टाश्छद्मका ये दुराशयाः । दुर्हृदो दुष्टभूपाला दुष्टामात्याश्च पापकाः ॥५९॥ ये च कार्यविलोप्तारो ये खलाः परिपंथिनः । सर्वस्वहारिणां ये च पंच मायाविनोऽपरे ॥६०॥ महाक्लेशकरा म्लेच्छा दस्यवो वृषलाश्च ये । येऽग्निदा गरदातारो वंचका शस्त्रपाणयः ॥६१॥ ये पापा दुष्टकर्माणो दुःखदा दुष्टबुद्धयः । व्याजकाः कुपथासक्ता ये च नानामयप्रदाः ॥६२॥ छिद्रान्वेवरता नित्यं येऽस्मान्बाधितुमुद्यताः । ते सर्वे कार्तवीर्यस्य महाशंखरवाहताः ॥६३॥ सहसा विलयं यान्तु दूरादेव विमोहिताः । ये दानवा महादित्या ये यक्षा ये च राक्षसाः ॥६४॥ पिशाचा ये महासत्त्वा ये भूतब्रह्मराक्षसाः । अपस्मारग्रहा ये च ये ग्रहाः पिशिताशनाः ॥६५॥ दुःख, मानसी पीड़ा, महाज्वर, आधि, व्याधि, विघ्न, ज्वालोपद्रव आदि का लेश मात्र भी भय न हो ॥४४-५०३॥ महारथी कार्तवीर्य अपने सहस्र भुजदण्ड से मेरे धन लूटने के लिये आने वाले दस्युओं का निवारण करें । कृतवीर्य के पुत्र मेरे अत्यन्त दुर्जय शत्रुओं को सहस्रों पाशों में बांध कर निश्चेष्ट कर दें । राजशिरोमणि (कार्तवीर्य) मेरे विरोधियों को शीघ्र सहस्रों अंकुशों से छिन्न-भिन्न करें, सहस्रों बाणों से विद्ध करें । हजारों तलवारों से खंडित करें और सहस्रों मुसलों से पीड़ित करें । सहस्रों सहस्र दल कमल धारण करनेवाले कमलाक्ष सहस्रार्जुन चोर आदि दुष्ट जीवों को अपने शंख के नाद से भयभीत करें । हरि के साक्षात् अवतार रूप कार्तवीर्य मेरी सब तरह से रक्षा करें ॥५१-५५३॥ कार्तवीर्य ! महाशक्तिशालिन् ! निखिलदुष्टविनाशक ! सबकाल, सब जगह दुष्टों एवम् चोरों का नाश कीजिए । दुष्टों के मारने वाले ! क्या आप सो रहे हैं ? कहां खड़े हैं ? क्यों विलम्ब कर रहे हैं ? उठिये, अपने पुत्रों की तरह मुझे सब प्रकार के भयों से बचाइए। जितने चोर, धनहर्ता, द्वेष करने वाले, हिंसक, साधुओं को सताने वाले, दुष्ट, कपटी, दूषित हृदय वाले, दुष्ट विचार वाले, दुष्ट राजा, दुष्ट मन्त्री, पापी, कार्यध्वंसक, खल, शत्रु, सर्वस्वहारी, मायावी, महादुःखदायक, म्लेच्छ, दस्यु, शूद्र, आग में डालने वाले, विष देने वाले, वंचक, शस्त्रजीवी, सूदखोर, कुपथगामी, लोगों को डराने वाले, छिद्रान्वेषी तथा हमें बाधा पहुँचाने वाले हैं, वे कार्तवीर्य के महाशंखध्वनि से निहत हो और दूर ही से मोहित होकर विनष्ट हो जायें ॥५६-६३३॥ दानव, महादैत्य, यक्ष, राक्षस, पिशाच, भयानक जीव, भूत, ब्रह्मराक्षस, अपस्मारग्रह, मांसाहारी तथा महाशोणितभक्षी वेताल, गुह्य, गंधर्व, अप्सरोगण, सिद्धगण, देवयोनि, डाकिनी, द्रूणस, १ प्रेत, क्षेत्रपाल, विनायकगण, महाव्याघ्र, १. एक गण, जिनकी बड़ी-बड़ी नाक होती है।