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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 925, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 925

६०६ नारदीयपुराणम् भूर्लोकवर्णनं चैव सप्ताधोलोकवर्णनम् । पंचोर्ध्वलोककथनं ब्रह्मांडस्थितिकीर्तनम् ॥३१॥ ब्रह्मांडानेकचरितं ब्रह्मजीवनिरूपणम् । आत्यंतिकं लयाख्यानं फलस्तुतिनिरूपणम् ॥३२॥ इत्येतद्गारुडं नाम पुराणं भुक्तिमुक्तिदम् । कीर्तितं पापशमनं पठतां शृण्वतां नृणाम् ॥३३॥ लिखित्त्वैतत्पुराणं तु विषुवे यः प्रयच्छति । सौवर्णहंसयुग्माढ्यं विप्राय स दिवं व्रजेत् ॥३४॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे गारुडानुक्रमणीवर्णनं नामाष्टोत्तरशततमोऽध्यायः ॥१०८॥ नवाधिकशततमोऽध्यायः ब्रह्मोवाच शृणु वत्स प्रवक्ष्यामि ब्रह्मांडाख्यं पुरातनम् । यच्च द्वादशसाहस्रमादिकल्पकथायुतम् ॥१॥ प्रक्रियाख्योऽनुषंगाख्य उपोद्घातस्तृतीयकः । चतुर्थ उपसंहारः पादाश्चत्वार एव हि ॥२॥ पूर्वपादद्वयं पूर्वो भागोऽत्र समुदाहृतः । तृतीयो मध्यमो भागश्चतुर्थस्तूत्तरो मतः ॥३॥ लोककथन, ब्रह्मांडस्थितिकीर्तन, ब्रह्मांड के अनेक चरित्र, ब्रह्मजीवनिरूपण, आत्यंतिकलयाख्यान और फलस्तुति- निरूपण इतने विषयों का दिग्दर्शन कराया। यह गरुड़पुराण पढ़ने तथा सुनने वालों के लिए भुक्ति-मुक्तिदायक तथा पापनाशक है। इस पुराण को लिखकर विषुव में जो व्यक्ति ब्राह्मण को युगल स्वर्णहंससहित यह प्रदान करता है, उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है ॥२९-३४॥ श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में गरुड़ानुक्रमणीवर्णन नामक एक सौ आठवां अध्याय समाप्त ॥१०८॥ अध्याय १०६ ब्रह्माण्डपुराण की विषयानुक्रमणी ब्रह्मा बोले-वत्स ! सुनो; मैं प्राचीन ब्रह्मांडपुराण को कहता हूँ। यह बारह हजार श्लोकों से परिपूर्ण तथा आदि कल्प की कथाओं से युक्त है। इस पुराण के प्रक्रिया, अनुषंग, उपोद्घात और उपसंहार नामक चार पाद हैं। दो पाद इसका पूर्व भाग है, तीसरा पाद मध्यम भाग है और चतुर्थ उत्तर भाग है ॥१-३॥