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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 927, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 927

६०८ नारदीयपुराणम् चतुर्थमुपसंहारं वक्ष्ये खण्डे तथोत्तरे। वैवस्वतांतराख्यानं विस्तरेण यथातथम् ॥२३॥ पूर्वमेव सबुद्धिष्टं संक्षेपादिह कथ्यते । भविष्याणां मनूनां च चरितं हि ततः परम् ॥२४॥ कल्पप्रलयनिर्देशः कालमानं ततः परम् । लोकाश्चतुर्दश ततः कथिताः प्राप्तलक्षणैः ॥२५॥ वर्णनं नरकाणां च विकर्माचरणैस्ततः । मनोमयपुराख्यानं लयः प्राकृतिकस्ततः ॥२६॥ शेषस्याथ पुरस्यापि वर्णनं च ततः परम् । विविधागुणसंबंधाज्जंतूनां कीर्तिता गतिः ॥२७॥ अनिर्देश्याप्रतर्क्यस्य ब्रह्मणः परमात्मनः । अन्वयव्यतिरेकाभ्यां वर्णनं हि ततः परम् ॥२८॥ इत्येष उपसंहारपादो वृत्तः सहोत्तरः । चतुष्पादं पुराणं ते ब्रह्मांडं समुदाहृतम् ॥२६॥ अष्टादशमनौपम्यं सारात्सारतरं द्विज । ब्रह्मांडं यच्चतुर्लक्षं पुराणं येन पठ्यते ॥३०॥ तदेतदस्य गदितमष्टादशधा पृथक् । पाराशर्येण मुनिना सर्वेषामपि मानव ॥३१॥ वस्तुतस्तूपदेष्ट्राथ मुनीनां भावितात्मनाम् । मत्तः श्रुत्वा पुराणानि लोकेभ्यः प्रकाशिर ॥३२॥ मुनयो धर्मशीलास्ते दीनानुग्रहकारिणः । मया चेदं पुराणं तु वसिष्ठाय पुरोदितम् ॥३३॥ तेन शक्तिसुतायोक्तं जातकूण्याय तेन च । व्यासो लब्ध्वा ततश्चैतत्प्रभंजनमुखोद्गतम् ॥३४॥ प्रमाणीकृत्य लोकेऽस्मिन्प्रावर्तयदनुत्तमम् । य इदं कीर्तयेद्भक्त्या शृणोति च समाहितः ॥३५॥ स विधूयेह पापानि याति लोकमनामयम् । लिखित्वातत्पुराणं तु स्वर्णसिंहासनस्थितम् ॥३६॥ वस्त्रेणाच्छादितं यस्तु ब्राह्मणाय प्रयच्छति । स याति ब्रह्मणो लोकं नात्र कार्या विचारणा ॥३७॥ मरीचेऽष्टादशैतानि मया प्रोक्तानि यानि ते । पुराणानि तु संक्षेपाच्छ्रोतव्यानि च विस्तरात् ॥३८॥ अष्टादश पुराणानि यः शृणोति नरोत्तमः । कथयेद्वा विधानेन नेह भूयः स जायते ॥३६॥

अब उत्तर भागस्य चतुर्थ उपसंहार पाद का वर्णन करूँगा। पूर्व में वैवस्वतान्तराख्यान विस्तृत रूप से उक्त होने पर भी इस पाद में संक्षेप से कहा गया है। तदनन्तर भावी मनुष्यों का चरित्र, कल्पप्रलयनिर्देश, काल- मान, चौदह लोकों का कथन, नरकों का वर्णन, कुत्सित कर्मों का आचरण, मनोमयपुराख्यान, प्राकृतिकलय, शेषपुर का वर्णन, गुणों के संपर्क से जीवों की तीन प्रकार की गति, अन्वयव्यतिरेक से अनिर्देश्य तथा अतर्क्य पर- मात्मा ब्रह्म का वर्णन हुआ है। यहो उत्तरखंडीय उपसंहारपाद है। चार पादों से युक्त ब्रह्मांडपुराण तुम्हें बतला दिया गया ॥२३-२९॥ द्विज ! यह अठारहवाँ पुराण है जो सब पुराणों का सार माना गया है। इसमें चार लाख श्लोक भी कहे जाते हैं। पराशरपुत्र व्यास ने इसी पुराण को अठारह भागों में विभक्त करके प्रकाशित किया है। मानव ! संयतात्मा मुनियों को वस्तु तत्त्व का उपदेश देने वाले व्यास ने मुझसे पुराणों को सुनकर लोक में प्रचार किया। दीनों के ऊपर अनुग्रह करने वाले धर्मशील मुनियों ने व्यास से पुराणों को प्राप्त किया। पूर्वकाल में वसिष्ठ से मैंने ब्रह्मांड पुराण को बतलाया था। पश्चात् उन्होंने शक्तिसुत व्यास से और व्यास ने जातूकर्ण्य से कहा। व्यास ने प्रभंजन के मुख से निःसृत इस पुराण को प्राप्त कर लोक में प्रमाणित करके प्रचार किया। वत्स ! जो व्यक्ति समाहित होकर इसका पाठ तथा श्रवण करेगा, वह निष्पाप होकर अक्षयलोक को जायेगा। जो इस पुराण को लिखकर स्वर्ण के सिंहासन पर ऊनी वस्त्र से आच्छादित करके ब्राह्मण को समर्पित करता है, उसे ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है, इसमें विचार करने की आवश्यकता नहीं ॥३०-३७॥ मरीचे ! यह जो मैंने संक्षेप से पुराणों को बतलाया है, उन्हें विस्तार से सुनना चाहिये। जो उत्तम मानव अठारहों पुराणों को विधिपूर्वक सुनता है या कथा करता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। अभी जो सूत्र रूप में