बार्हस्पत्य सूत्र / अर्थशास्त्र (महर्षि बृहस्पति - प्राचीन दण्डनीति, राजधर्म एवं कूटनीति सटीक)

बार्हस्पत्य सूत्र / अर्थशास्त्र (महर्षि बृहस्पति - प्राचीन दण्डनीति, राजधर्म एवं कूटनीति सटीक)
Brihaspati Sutra or Barhaspatya Rajanitishastra with Commentary
महर्षि बृहस्पति (सम्पादक: डॉ. एफ. डब्ल्यू. थॉमस) द्वारा
DevanagariHindipublished100 पृष्ठ
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[पञ्चमोऽध्यायः ।] चत्वार उपायाः ॥१॥ त्रयश्च ॥२॥ मायोपेत्ता वधश्च ॥३॥ मूरीषु साम ।४। शङ्कितेषु सामभेदौ ॥५॥ लुब्धेषु सामदानभेदाः॥६॥ कृष्टेषु सामभेददानमायोपेत्तावधाः ॥७॥ साम पूर्वं प्रयोक्तव्यम् ॥८॥ [१.६क] मनसोऽभिप्रायं वाचः प्रीतिकर्म च ॥६॥ ज्ञातीनां ज्ञातयो व्यसने हृष्यन्ति ॥१०॥ ज्ञातिं ज्ञातयः प्रच्छन्नहृदयाः क्रूरा उपद्रवन्ति ॥११॥ सर्वभयेषु ज्ञातिभयं घोरम् ॥१२॥ गोषु पयः ब्राह्मणे कोपश्च ॥१३॥ स्त्रीषु चापलं दूरत्वं ज्ञातिषु सौहृदं पत्रजलविन्दुवत् ॥१४॥ हितं गुरुजनवाक्यं शास्त्रचोदितं च ये न शृण्वन्ति कालचो- दिताः तस्मात् तान् सुपरिहृत्यान्यत्र वसेत् ॥१५॥
- W ०शश् । 2. W ०मः। 3. Sic (neut.) 4. W ०न्नयां ।
- W स्स । 6. W तपश् । 7. W पद्मपत्र० । 8. M एकं
संक्षिप्त हिन्दी अनुवाद एवं व्याख्या (Commentary)
- सूत्र १–३: नीतिशास्त्र में मूल रूप से चार उपाय (साम, दान, भेद, दण्ड) कहे गए हैं। कहीं तीन उपाय माने गए हैं, तथा अन्यत्र माया (कूटनीति), उपेक्षा और वध को भी उपायों में गिना गया है।
- सूत्र ४–७: विभिन्न प्रकृतियों के अनुसार उपाय-प्रयोग:
- मूर्खों/सरलजनों के प्रति साम (समझाने-बुझाने) का प्रयोग करना चाहिए।
- शंकित (संदेही) जनों पर साम और भेद नीति अपनानी चाहिए।
- लोभी व्यक्तियों को वश में करने हेतु साम, दान एवं भेद का प्रयोग किया जाता है।
- असंतुष्ट/कुपित (कृष्ट/क्रुद्ध) जनों के शमन के लिए साम, भेद, दान, माया, उपेक्षा और वध तक के उपाय विहित हैं।
- सूत्र ८–१०: सर्वप्रथम 'साम' (शांति/सद्भाव) का ही प्रयोग करना चाहिए। वाणी का प्रीतिकर होना और मन के अनुकूल भाव प्रकट करना सामनीति का मुख्य अंग है।
- सूत्र ११–१५ (ज्ञाति-स्वभाव एवं नीति):
- बन्धु-बान्धव (ज्ञाति) अपने ही स्वजनों के संकट या विपत्ति में मन ही मन प्रसन्न होते हैं।
- कपटी हृदय वाले क्रूर सम्बन्धी विपत्ति के समय घात लगाकर प्रहार (उपद्रव) करते हैं।
- समस्त भयों में अपने ही बान्धवों से उत्पन्न भय सबसे दारुण एवं घोर होता है।
- जैसे गायों में दूध और ब्राह्मण में कोप स्वाभाविक है; वैसे ही स्त्रियों में चंचलता एवं सम्बन्धियों में सौहार्द (स्नेह) कमल-पत्र पर पड़ी जल की बूँद के समान क्षणभंगुर व अस्थिर होता है।
- जो व्यक्ति काल (विनाश) से प्रेरित होकर गुरुजनों के हितकारी वचनों और शास्त्र-सम्मत उपदेशों को नहीं सुनते, उनका पूर्णतः त्याग कर अन्यत्र निवास करना चाहिए।