बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें.कारकांशफलमाह ११५ कुम्भांश में कारक हो तो तालाब आदि का रचयिता, यशस्वी और धार्मिक होता है॥१४॥ मीने च कारकांशे वै सायुज्यमुक्तिभाग्भवेत्। शुभयोगे शुभं ब्रूयात्रशुभं विपरीतके॥१५॥ मीनांश में कारक हो तो साक्षात् मोक्ष पाता है। शुभग्रह के योग से शुभ फल और पापग्रह के योग से अशुभ फल होता है॥१५॥ शुभांशे शुभराशौ वा कारके धनवान् भवेत्। लग्नांशे चेच्छुभो वा स्याद्राजा भवति निश्चितम्॥१६॥ यदि आत्मकारक शुभग्रह के अंश में वा शुभग्रह की राशि में हो तो जातक धनी होता है। एवं आत्मकारकांश में अथवा लग्नांश में शुभग्रह हो तो निश्चय ही राजा होता है॥१६॥ उपग्रहे शुभांशे चेत्स्वोच्चस्वर्क्षे शुभर्क्षभे। पापदृग्योगरहिते चान्त्ये कैवल्यं विनिर्दिशेत्॥१७॥ यदि उपग्रह शुभग्रह के अंश में हो अथवा अपनी उच्चराशि या अपनी राशि के शुभग्रह की राशि में हो, पापग्रह के दृष्टि और योग से रहित हो तो अन्त में मोक्ष की प्राप्ति होती है॥१७॥ चन्द्रभृग्वारवर्गस्थे कारके पारदारिकः। मिश्रे मिश्रं विजानीयाद्विपरीते विपर्ययम्॥१८॥ यदि आत्मकारक चन्द्र, शुक्र या भौम के षड्वर्ग में हो तो परस्त्री का सुख भोगने वाला होता है। उपर्युक्त फलों में मिश्रित ग्रह (शुभ और पाप दोनों) का संबंध हो तो मिश्रित फल और विपरीत हो तो विपरीत फल कहना चाहिए॥१८॥ कारकांशस्थितग्रहाणां फलम्- अथैकः कारकांशेषु रव्यादिस्तिष्ठति ग्रहः। तेषां फलं प्रवक्ष्यामि शृणु त्वं द्विजसत्तम॥१९॥ अब सूर्यादि ग्रहों का फल आत्मकारकांश के अनुसार कह रहा हूँ॥१९॥ कारकांशे यदा सूर्यस्तिष्ठति द्विजवीर्ययुक्। आदावन्ते पुमान् सोऽपि राजकार्येषु तत्परः॥२०॥ यदि आत्मकारकांश में बलवान् सूर्य हो तो जातक अवस्था के आदि और अंत मे राजकर्मचारी होता है॥२०॥