बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकारकांशफलमाह ११७ कारकांशे यदा केतुस्तिष्ठति द्विजसत्तम। व्यवहारी गजादीनामुशन्ति परद्रव्यके ॥१२८॥ कारकांश में केतु हो तो हाथी आदि का व्यवहार दूसरे के द्रव्य से करने वाला होता है॥१२८॥ कारकांशे यदा विप्र संस्थितौ रविसैंहिकौ। सर्पाद्भीतिर्भवेन्मृत्युः शुभदृष्ट्या निवर्तते ॥१२९॥ यदि कारकांश में सूर्य और राहु हों तो सर्प से भय या मृत्यु होती है, शुभग्रह की दृष्टि हो तो निवृत्ति हो जाती है॥१२९॥ कारकांशे भानुतमौ शुभषड्वर्गसंयुतौ। विषवैद्यो भवेन्नूनं विषहर्ता विचक्षण॥१३०॥ कारकांश में सूर्य और राहु हों और शुभ ग्रह के षड्वर्ग में हों तो विषवैद्य या विष का हरण करने वाला होता है॥१३०॥ भौमेक्षिते कारकांशे भानुस्वर्भानुसंयुते। अन्यग्रहा न पश्यन्ति स्ववेश्मपरदाहकः॥१३१॥ कारकांश में सूर्य और राहु हों, उसे भौम देखता हो शेष ग्रह न देखते हो तो अपना और दूसरे का घर जलाने वाला होता है॥१३१॥ सगुलिके कारकांशे पूर्णेन्दुवीक्षिते द्विज। सति चौरैर्णीतधनः स्वयं चौरोऽथवा भवेत्॥१३२॥ कारकांश में गुलिक हो और पूर्ण चन्द्र से देखा जाता हो तो चोरों से धन अपहृत होता है अथवा स्वयं चोर होता है॥१३२॥ सगुलिके कारकांशे अन्यग्रहयुतेक्षिते। बुधदृष्टियुते वापि अण्डवृद्धिः प्रजायते॥१३३॥ कारकांश में गुलिक हो और अन्य ग्रहों से देखा जाता हो अथवा बुध से दृष्ट वा युत हो तो अंडवृद्धि होती है॥१३३॥ कारकांशे केतुयुक्ते पापग्रहनिरीक्षिते। श्रोत्रच्छेदं भवेन्नूनं कर्णरोगार्तिना द्विज॥१३४॥ कारकांश में केतु हो और पापग्रह से देखा जाता हो तो कर्णरोग से पीड़ित होने से कान काटा जाता है॥१३४। कारकांशे स्थिते केतौ भृगुणा च समीक्षिते। युते वा जायते विप्र क्रियाकर्मसमन्वितः॥१३५॥