बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वादशभावविचाराध्यायः १५७ पश्चात्सहोदरोऽप्येकस्तृतीयस्तु मृतो भवेत्। कारके राहुसंयुक्ते विक्रमेशस्तु नीचगः॥५५॥ उसके बाद एक भाई होता है और तीसरा मर जातां है। भ्रातृकारक राहु से युक्त हो और तृतीयेश नीच राशि में हो तो॥५५॥ पश्चात्सहोदराभावः पूर्वं तु तत्त्रयं भवेत्। भ्रातृस्थानाधिपे केन्द्रे कारके तत्त्रिकोणगे ॥५६॥ उससे छोटे भाइयों का अभाव और उससे बड़े ३ भाई होते हैं। भ्रातृस्थान के स्वामी केन्द्र में हों और भ्रातृकारक उससे त्रिकोण में॥५६॥ जीवेन सहितश्चोच्चे संख्या द्वादश सोदराः। तत्र पूर्वद्वयं गर्भं जातकाच्च तृतीयकम्॥५७॥ सप्तमश्चैव नवमो द्वादशश्च मृतिप्रदः। शेषाः सहोदराः षड्वै भवेयुर्दीर्घजीविनः॥५८॥ गुरु के साथ अपनी उच्चराशि में हो तो १२ भाई होते हैं। उसमें दो बड़े, तीसरा, सातवाँ, नवाँ और बारहवाँ मर जाता है। शेष ६ भाई दीर्घजीवी होकर रहते हैं॥५७-५८॥ व्ययेशेन युते भौमे गुरुणा सहितोऽपि वा। भ्रातृस्थाने शशियुते सप्तसंख्यास्तु सोदराः॥५९॥ व्ययेश से भौम युत हो वा गुरु से युक्त हो और तीसरे भाव में चन्द्रमा हो तो सात भाई होते हैं॥५९॥ अथ चतुर्थभावफलम्— गेहाधिनाथेन युते तु गेहे देहाधिपेनापि गृहाभिलब्धिः। युते षडादौ तु विपर्ययः स्याद्गृहाधिपे देहपतौ च तद्वत्॥ यदि सुखभाव सुखेश और लग्नेश से युक्त हो तो गृह का लाभ होता है। यदि लग्नेश, सुखेश ६।८।१२ भाव में हो तो गृहप्राप्ति नहीं होती है॥६०॥ केन्द्रत्रिकोणे च शुभग्रहेण युते समीचीनगृहाभिलब्धिः। क्षेत्रस्य चिन्ता सदनाधिपेन जीवेन चिन्ता तु सुखस्य कार्या॥६१॥