बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
पृष्ठ 211, कुल 800 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथानेकयोगाध्यायः २१३ कामी कलानिधिभवा सुगुणाभिरामः संस्तूयमानचरणो नरपालमुख्यैः। सेनांतुरङ्गमदवारणशङ्खभेरी वाद्यान्वितो विगतरोगभयारिसङ्घः ।।३३।। दूसरे या पाँचवें स्थान में गुरु हो, बुध, शुक्र से युत वा दृष्ट हो अथवा इन्हीं की राशि में हो तो 'कलानिधि' योग होता है। कलानिधि योग में उत्पन्न पुरुष कामी, सुंदर गुणों से युक्त, राजाओं से पूज्यचरण वाला, सेना, घोड़ा, मतवाले हाथी, शंख, भेरी आदि बाजाओं से युक्त, रोग, भय और शत्रु से रहित होता है।।३२-३३।। अथ पारिजातादियोगफलानि— सपारिजातद्युचरः सुखानि नीरोगतामुत्तमवर्गयातः। सगोपुरांशो यदि गोधनानि सिंहासनस्थः कुरुते विभूतिम् ।।३४।। करोति पारावतभागयुक्तो विद्यायशःश्रीविपुलं नराणाम्। सदेवलोको बहुयानसेनामैरावतस्थो यदि भूपतित्वम् ।।३५।। अपने पारिजात भाग (पृ० ५३) में ग्रह हो तो सुख होता है। उत्तम वर्ग में हो तो नीरोग करता है। गोपुरांश में हो तो गौ और धन देता है। सिंहासनांश में हो तो विभूति अर्थात् ऐश्वर्य को देता है। पारावत भाग में हो तो विद्या, यश, विपुल लक्ष्मी को देता है। देवलोकांश में हो तो अनेक सवारी और सेना से युक्त होता है। ऐरावत अंश में हो तो जातक राजा होता है।।३४-३५।। अथ लग्नाधियोगस्तत्फलं चाह— लग्नाच्च दाराष्टमगेहसंस्थैः शुभैर्न पापग्रहयोगदृष्टैः। लग्नाधियोगो हि तथा प्रसिद्धः पापैः सुखस्थानविवर्जितैश्च ।।३६।। लग्नाधियोगे बहुशास्त्रकर्त्ता विद्याविनीतश्च बलाधिकारी। मुख्यस्तु निष्कापटिको महात्मा लोके यशोवित्तगुणाधिकः स्यात्।। लग्न से सातवें, आठवें भाव में शुभग्रह पापग्रह से दृष्ट-युत न हों और चौथे भाव में पापग्रह न हों तो लग्नाधियोग होता है। लग्नाधियोग में उत्पन्न जातक अनेक शास्त्रों को बनाने वाला, विद्वान्, नम्र, सेनाधिकारी, मुख्यतः निष्कपट महात्मा और संसार में यश, धन और गुण से प्रसिद्ध होता है।।३६-३७।।