बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ राजयोगाध्यायः २२५ उच्चग्रहे राजयोगो लग्नद्वयमथापि चेत्। राशेद्रेष्काणंतोंऽशाच्च राशेरंशादथापि वा।।२०।। इन दोनों भावों को अपने उच्च में बैठा ग्रह देखता हो अथवा लग्न और दूसरे भाव को देखता हो तो राजयोग होता है।।२०।। जन्मकालघटीलग्न एकेनैव निरीक्षिते। उच्चारूढे तु सम्प्राप्ते चन्द्राक्रान्ते विशेषतः।।२१।। भावलग्न, होरालग्न और घटीलग्न को कोई ग्रह देखता हो तो राजयोग होता है। इसमें भी लग्नपद वा चन्द्र के साथ कोई उच्चस्थ ग्रह हो तो विशेष राजयोग होता है।।२१।। क्रान्ते वा गुरुशुक्राभ्यां केनाप्युच्चग्रहेण वा। दुष्टार्गलाग्रहाभावे राजयोगो न संशयः।।२२।। लग्नपद वा चन्द्र के साथ कोई उच्च ग्रह हों, उसमें गुरु-शुक्रं का योग हो और पापग्रह कृत अर्गला योग हो तो निःसंशय राजयोग होता है।।२२।। शुभारूढे तत्र चन्द्रे धने देवगुरुस्तथा। राजयोगप्रदाता च निर्विशङ्कं द्विजोत्तम।।२३।। अथवा पदस्थान में चन्द्रमा हो, उससे दूसरे गुरु हो तो निश्चय ही राजयोग होता है।।२३।। शुभे लग्ने शुभे त्वर्थे तृतीये पापखेचरैः। चतुर्थे तु शुभे प्राप्ते राजा वा तत्समोऽपि वा।।२४।। शुभग्रह लग्न द्वितीय और चतुर्थ में हों और तीसरे भाव में पापग्रह हों तो राजा वा राजा के समान होता है।।२४।। उच्चस्थे हरिणाङ्को वा जीवो वा शुक्र एव वा। एको बली धनगतः श्रियं दिशति देहिनः।।२५।। यदि चन्द्रमा, गुरु वा शुक्र में कोई अपनी उच्चराशि का बली होकर दूसरे भाव में हो तो लक्ष्मीप्राप्ति होती है।।२५।। लग्नं पश्यति ये खेटास्ते सर्वे शुभदायिनः। नीचखेटोऽपि लग्नं चेत्पश्येद्राजा प्रकीर्त्तितः।।२६।। लग्न को जो ग्रह देखते हैं वे सभी शुभ देने वाले होते हैं। यदि अपनी नीच राशि में स्थित ग्रह लग्न को देखता हो तो राज्यदायक होता है।।२६।।