बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ राजप्रधानयोगाध्यायः २२७ अमात्यकारकेणापि कारकेन्द्रेशसंयुते। तीव्रबुद्धियुतो बालः सेनाधीशोऽपि जायते॥३॥ आत्मकारक के राशीश अमात्यकारक से युत-दृष्ट हो तो बालक कड़ी तीक्ष्ण बुद्धि का सेनापति होता है॥३॥ कारके केन्द्रकोणेषु तुङ्गर्क्षे चापि संस्थिते। भाग्यपेन युते दृष्टे राजमन्त्री प्रजायते॥४॥ आत्मकारक अपने उच्च का होकर केन्द्र (१।४।९।१०) वा कोण (९।५) में हो और भाग्येश से युत वा दृष्ट हो तो राजमंत्री होता है॥४॥ कारको यस्य राशीशे लग्नगे संयुतेक्षिते। मन्त्रित्वमुख्ययोगोऽयं वार्धके नात्र संशयः॥४॥ आत्मकारक ही जन्मराशीश होकर लग्न में और भाग्येश से युत वा दृष्ट हो तो वृद्धावस्था में मुख्यमंत्री होता है॥५॥ कारके शुभसंयुक्ते पञ्चमे सप्तमेऽपि वा। यत्कारके यदा प्राप्ते तत्कारके धनं लभेत्॥६॥ आत्मकारक शुभग्रह से युक्त होकर पाँचवें वा सातवें भाव में जिस भाव के कारक से युक्त होता है उसके द्वारा धन का लाभ होता है॥६॥ भाग्यारूढपदे लग्ने कारके नवमेऽपि वा। राजयोगप्रदातारौ निर्विशङ्कं द्विजोत्तम॥७॥ भाग्यभाव का पद लग्न में वा आत्मकारक नवम भाव में हो तो राजसंबंधकारक होते हैं॥७॥ लाभेशो लाभभवने पापदृष्टिविवर्जितः। कारके शुभसंयुक्ते लाभं तस्य नृपालयात्॥८॥ लाभेश लाभभाव में हो, पापग्रह से न देखा जाता हो, आत्मकारक शुभग्रह से युत हो तो राजा के यहाँ से लाभ होता है॥८॥ कारकात्तूर्यभावस्थौ सितेन्दू द्विजसत्तम। आदावन्ते विशेषस्य राजचिह्नेन संयुतः॥८॥ कारक से चौथे भाव में शुक्र और चन्द्रमा हों तो आयु के पूर्वार्ध में और अंतिम में राजचिह्नों से युक्त होता है॥९॥ इति राजप्रधानयोगाध्यायः।