भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 296, कुल 800 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 296

२९८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् यदि इस योग में शुभयोग भी हो तो निश्चय ही इसके शूलान्त पर्यन्त आयु होती है॥४४॥ उभौ रुद्रौ शुभैर्दृष्टावथवा योगद्वयोरपि। शुभग्रहेण क्लेशश्च रुद्रशूलान्तमायुषि॥४५॥ दोनों रुद्र शुभ ग्रहों से दृष्ट और योग करते हों तो रुद्रशूलान्त आयु न हाकर केवल क्लेशमात्र होता है॥४५॥ प्राणी चाप्राणिरुद्राभ्यां कृतयोगद्वयेन च। तयोर्वा सम्प्रवक्ष्यामि तवाग्रे द्विजसत्तम॥४६॥ बलवान् या निर्बल रुद्रों से दोनों योगों में जो विशेषता होती है, उसे कह रहा हूँ॥४६॥ मार्त्तण्डरहितो चान्यः पापयोगकृते द्विज। योगद्वयं न भवति पापयुक्तं द्वयोरपि॥४७॥ दोनों रुद्रों के दोनों योगों में सूर्य को छोड़कर अन्य पापग्रह योग करते हों तो दोनों योग नहीं होते हैं॥४७॥ शुभयोगः शुभैर्दृष्टेरुभयेऽपि विना रविम्। पापयोगकृते विप्र भययोगो विनश्यति॥४८॥ शुभयोग शुभग्रह से दृष्ट दोनों हों तो पापग्रह से उत्पन्न भययोग निवृत्त हो जाता है॥४८॥ शुभयोगः शुभदृष्टिरभावे न भवत्यपि। यत्रायुः कथयाञ्चक्रुर्वक्तव्यं द्विजसत्तम॥४९॥ शुभयोग शुभदृष्टि के अभाव में भी कुछ नहीं होता है॥४९॥ उभयोः पापयोगे च कश्चिद्रोगार्तिको भवेत्। क्लेशः शोको नृपाद्भीतिः देशपर्यटनं द्विज॥५०॥ यदि दोनों पाप योग करते हों तो कुछ रोग आदि होते हैं, क्लेश, शोक, राजा से भय, देशपर्यटन होता है॥५०॥ शुभदृष्टेरभावे च शुभयोगविवर्जिते। पापयोगप्रभावेण मरणं सारणं दृशा॥५१॥ शुभदृष्टि के अभाव में शुभयोग के बिना पापयोग के प्रभाव से मरण होता है॥५१॥