बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ पूर्वजन्मशापद्योतकाध्यायः ३५७ रोगेशे पुत्रभावस्थे पितृस्थानाधिपे तथा। कारके राहुसंयुक्ते पितृशापात्सुतक्षयः॥२९॥ रोगेश पंचम भाव में पितृभावेश के साथ हो और कारक (गुरु) राहु से युत हो तो पिता के साप से संतान की हानि होती है॥२९॥ तद्दोषपरिहारार्थं गयाश्राद्धं च कारयेत्। ब्राह्मणाम् भोजयेत्तत्र अयुतं वां सहस्त्रकम्॥३०॥ कन्यादानं ततः कृत्वा गां च दद्यात्सवत्सकाम्। एवं कृते पितुः शापान्मुच्यते नात्र संशयः॥३१॥ इस दोष के शान्त्यर्थ गयाश्राद्ध करे और एक हजार वा दस हजार ब्राह्मणों को भोजन करावे। इसके बाद कन्यादान और सवत्सा गौ का दान करे। इतना करने से पिता प्रसन्न होकर।॥३१॥ वर्धते च कुलं तस्य पुत्रपौत्रादिभिस्तदा। दृष्टियोगपदैः सर्वं फलं ब्रूयाद्विचक्षणः॥३२॥ उसे पुत्र-पौत्र से संपन्न कर कुल की वृद्धि करते हैं। इस प्रकार दृष्टि तथा योगवश पंडित लोग फल का विचार करें॥३२॥ अथ मातृशापात्सुतक्षययोगः- पुत्रस्थानाधिपे चन्द्रे नीचे वा पापमध्यगे। हिबुके पञ्चमे वापि मातृशापात्सुतक्षयः॥३३॥ पंचमेश चन्द्रमा अपनी नीच राशि में वा पापग्रह के मध्य में हो और ४, ५ भाव में पापग्रह हों तो माता के शाप से संतान की हानि होती है॥३३॥ लाभे मन्दसमायोगे मातृस्थाने शुभेतरे। नीचे पञ्चमगे चन्द्रे मातृशापात्सुतक्षयः॥३४॥ एकादश स्थान में शनि हो और चौथे भाव में पापग्रह हो तथा अपने नीच में चन्द्रमा पाँचवें भाव में हो तो माता के शाप से संतान की हानि होती है॥३४॥ पुत्रस्थानाधिपे दुःस्थे लग्नेशे नीचराशिगे। चन्द्रपापसमायोगे मातृशापात्सुतक्षयः॥३५॥ पंचमेश ६, ८, १२ भाव में हो, लग्नेश अपनी नीच राशि में हो तथा चन्द्रमा पाप से युत हो तो माता के शाप से संतान की हानि होती है॥३५॥