बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथान्तर्दशाफलविचाराध्यायः । ४५३ बहुसेनाधिपत्यं च शत्रुनाशं मनोदृढम् । आत्मबंधुसुखं चैव भ्रातृवर्धनकं तथा ।।३५।। सेनापति पद का लाभ, शत्रु का नाश आत्मीय बन्धुओं का सुख और भाइयों की वृद्धि होती है।।३५।। दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे पापयुक्ते च वीक्षिते । आधिपत्यबलैर्हीने क्रूरबुद्धिं मनोरुजम् ।।३६।। दशा के स्वामी से ६।८ भाव में पापग्रह से युक्त और दृष्ट तथा बलहीन भौम हो तो दुष्टबुद्धि, मानसिक कष्ट।।३६।। कारागृहे प्रवेशं च निर्गलं बन्धुनाशनम् । भ्रातृवर्गविरोधं च कर्मनाशमथापि वा ।।३७।। जेलयात्रा अनायास बन्धु का नाश, भाइयों से विरोध, कर्म का नाश होता है।।३७।। नीचेवा दुर्बले भौमे राजमूलाद्धनक्षयः । द्वितीयद्यूननाथे तु देहेजाड्यं मनोरुजम् ।।३८।। अपनी नीचराशि में दुर्बल भौम हो तो राजा के कोप से धन की हानि होती है। यदि २।७ भाव का स्वामी हो तो देह में जड़ता और मानसिक कष्ट होता है।।३८।। सुब्रह्मजपदानं च अनड्वाहं तथैव च । शांतिं कुर्वीत विधिवदायुरारोग्य सिद्धिदम् ।।३९।। इसकी शान्ति के लिये वेदपाठ, गायत्री का जप, दान, बैल का दान आदि करने से आयु, आरोग्यता आदि की सिद्धि होती है।।३९।। अथ रविदशायांराह्वन्तर्दशाफलम्- सूर्यस्यान्तर्गते राहौ लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे । आदौ द्विमासपर्यन्तं धननाशं महद्भयम् ।।४०।। सूर्य की दशा में लग्न से केन्द्र वा त्रिकोण में गये हुये राहु की अन्तर्दशा हो तो पहले २ मास पर्यन्त धन का नाश और महाभय होता है।।४०।। चौरादिव्रणभीतिश्च दारपुत्रादिपीडनम् । तत्परं सुखमाप्नोति शुभयुक्ते शुभांशके ।।४१।।