बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथान्तर्दशाफलविचाराध्यायः । ५०१ गुरु की दशा में अपने उच्च वा अपनी राशि में केन्द्र वा त्रिकोण वा तीसरे वा लाभ स्थान में॥५०॥ भाग्ये वा बलसंयुक्ते दायेशाद्वा तथैव च । तत्काले धनलाभः स्याद्राजसन्मानवैभवम् ।।५१।। वा भाग्य स्थान में गये हुये बलवान् ग्रह से युक्त, इसी प्रकार दशेश से भी हों तो सूर्य के अन्तर में धन का लाभ, राजा से सन्मान, वैभव की प्राप्ति।।५१।। वाहनाम्बरपश्चादिभूषणम् पुत्रसम्भवम् । मित्रप्रभुवशादिष्टं सर्वकार्ये शुभावहम् ।।५२।। मित्र और राजा के द्वारा इष्ट की सिद्धि और सभी कार्य में सफलता की प्राप्ति होती है।।५२।। षष्ठाष्टमव्यये सूर्ये दायेशाद्वा तथैव च । शिरोरोगादिपीडा च ज्वरपीडा तथैव च ।।५३।। लग्न से वा दशेश से ६।८।१२ भाव में सूर्य हो तो शिर में रोग, ज्वर आदि से कष्ट।।५३।। सत्कर्मणि विहीनत्वं पापकर्म तथैव च । सर्वत्रजनविद्वेषो ह्यात्मबन्धुवियोगकृत् ।।५४।। अच्छे कर्मों से विरक्ति, पापकर्म में तल्लीनता सभी लोगों से विरोध, आत्मीय बंधुओं से वियोग।।५४।। अकस्मात्कलहं चैव जीवस्यान्तर्गते रवौ । द्वितीयद्यूननाथे तु देहपीडा भविष्यति ।।५५।। अकस्मात् कलह होता है। यदि सूर्य २ वा ७ भाव का स्वामी हो तो गुरु दशा में इसके अन्तर में देह में पीड़ा होती है।।५५।। तद्दोषपरिहारार्थमादित्यहृदयं जपेत् । सर्वपीडोपशमनं सूर्यप्रीतिं च कारयेत् ।।५६।। इस दोष के शान्त्यर्थ आदित्य हृदय का जप कराना चाहिये और सभी पीड़ाओं के शान्त्यर्थ सूर्य को प्रसन्न करना चाहिये।।५६।। अथगुरुदशायांचन्द्रान्तर्दशाफलम् - जीवस्यान्तर्गते चन्द्रे केन्द्रलाभत्रिकोणगे । स्वोच्चे वा स्वक्षंराशिस्ये पूर्णचन्द्रवलैयुते ।।५७।।