भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे व्यये वा पापसंयुते । अकस्मात्कलहंचैव पशुधान्यादिपीडनम् ।।९१।। दशेश से ६।८।१२ भाव में पापयुक्त हो तो अकस्मात् कलह, पशु, धान्य आदि की हानि होती है।।९१।। नीचस्थखेटसंयुक्ते लग्नात्षष्ठाष्टराशिगे । स्वबन्धुजनवैषम्यं शिराक्षिब्रणपीडनम् ।।९२।। नीच में गये हुये ग्रह से युक्त हो और लग्न से ६ वा ८ भाव में हो तो आत्मीय बन्धुओं से शत्रुता, नख, नेत्र व्रण आदि से पीडा।।९२।। हृद्रोगं मानहानिं च धनधान्यपशुक्षयम् । कलत्रपुत्रपीडाप्तस्संचारं देहरोगयुक् ।।९३।। हृदय रोग, मानहानि, धन धान्य पशु का नाश, स्त्री, पुत्र के रोगी होने का भय शरीर में रोग होता है।।९३।। द्वितीयद्यूननाथे तु देहजाड्यं मनोरूजम् । तद्दोषपरिहारार्थं दुगदिवीजपं चरेत् । श्वेतां गां च महिषीं दद्यादारोग्यप्रदायिनीम् ।।९४।। २ वा ७ भाव का स्वामी हो तो देह में जड़ता और मानसिक रोग होता है। इस दोष के शान्त्यर्थ दुर्गा देवी का जप करना चाहिये और आरोग्य देने वाली सफेद गौ और भैंस का दान करना चाहिये।।९४।। अथ केतुदशायां सूर्य्यान्तर्दशाफलम् - केतोरन्तर्गते सूर्ये स्वोच्चे स्वक्षेत्रगेऽपिवा । केन्द्रत्रिकोणलाभे वा शुभग्रहनिरीक्षिते ।।९५।। केतु की दशा में अपने उच्च वा अपनी राशि में केन्द्र वा त्रिकोण में लाभ में शुभग्रह से देखे जाते हुये सूर्य के अन्तर में।।९५।। धनधान्यादिलाभश्च राजानुग्रहवैभवम् । अनेकशुभकार्याणि चेष्टासिद्धिः सुखावहा ।।९६।। धन धान्यादि का लाभ, राजा की कृपा से वैभव का लाभ, अनेक शुभ कार्य और सुखकर अभीष्ट की सिद्धि होती है।।९६।। दायेशात्केन्द्रकोणे वा लाभे वा धनसंस्थिते । देहसौख्यं कार्यलाभं पुत्रलाभं मनोदृढम् ।।९७।।