बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ५४५ शनि के अंतर में अनेक सुख, इष्टबंधु से युक्त 'सम्मान' अनेक लोगों से सम्मान, कन्या का जन्म।।५२।। पुण्यतीर्थफलावाप्तिर्दानधर्मादिपुण्यकृत् । स्वप्रभोश्च विशेषःस्याद्वैपरीत्येक्लेशभाग्भवेत् ।।५३।। पुण्य तीर्थ के फल की प्राप्ति, दान धर्म आदि पुण्य, अपने स्वामी से विशेष सम्मान होता है। इसके विपरीत याने नीच राशि में हो तो कष्ट होता है।।५३।। देहालस्यमवाप्नोति आयाद्वाअधिकव्ययम् । षष्ठाष्टमव्यये मन्दे दायेशाद्वातथैव च ।।५४।। शरीर में आलस्य, आमदनी से अधिक खर्च होता हैं। लग्न से वा दशेश से ६।८।१२ भाव में शनि हो तो।।५४।। भुक्त्यादौ च महत्पीडा पितृमातृजनावपि । दारपुत्रादिपीडा च संसारे देहविभ्रमम् ।।५५।। अंतर के आदि महा पीड़ा, पिता-माता को भी कष्ट, स्त्री-पुत्र को कष्ट, संसार में भ्रम।।५५।। व्यवसायात्फलं नष्टं गोमहिष्यादिहानिकृत् । द्वितीयसप्तमाधीशे देहबाधा भविष्यति । तद्दोषपरिहारार्थं तिलहोमं च कारयेत् ।।५६।। व्यवसाय से हानि, गौ-भैंस की हानि होती है। २ वा ७ भाव के स्वामी हो तो शरीर में बाधा होती है। इसकी शान्ति के लिये तिल से हवन करना चाहिये।।५६।। अथशुक्रदशायांबुधानार्दशाफलम् - शुक्रस्यान्तर्गते सौम्ये केन्द्रे लाभत्रिकोणगे । स्वोच्चे वा स्वक्षेत्रगेवापि राजप्रीतिकरंशुभम् ।।५७।। शुक्र की दशा में केन्द्र वा लाभ वा त्रिकोण में वा अपने उच्च वा अपनी राशि में गये हुये बुध के अन्तर में राजा से प्रीति।।५७।। सौभाग्यं पुत्रलाभं च सन्मार्गे धनलाभकृत्। पुराणधर्मश्रवणं शृंगारिजनसंगमम् ।।५८।। सौभाग्य पुत्र का लाभ अच्छे मार्ग से धन का लाभ, पुराण और धर्मवार्ता का श्रवण, शृंगार करने वालों का समागम।।५८।।