बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६५२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्। के योग से उत्तम रीति से और पापग्रह अधिक हों तो दंड पातादि से मृत्यु कहना।। २४ ।। रश्मितः आयु साधनम् - अष्टभिर्गुणयेत्षड्भिर्विभज्यायुः परं भवेत् । वेश्मनि स्थानदा न स्युर्जन्मकाले स्फुटीकृताः ।।२५।। सूर्य और चतुर्थभाव के रश्मि संभव को ८ से गुणकर ६ से भाग लब्ध परम आयु होती है।।२५।। करणाद्यभावेकरणादिद्वारा भाव विचारः- कलीकृतश्च खनखैर्विभज्याब्दादयः क्रमात् । एवं शुभाशुभं ब्रूयान्मातापित्रोर्द्विजोत्तम ।। २६ ।। यदि चतुर्थभाव में रेखाप्रद ग्रह न हों तो चतुर्थ भाव का कला पिंड बनाकर उसमें २०० से भाग देने से वर्षादि आयु होती है इसंपर से माता पिता के शुभाशुभ फल को कहना।।२६।। करणस्थानदातारः पापपुण्य फलप्रदाः । पुनश्चोच्चादिषु तथा त्रिगुणाद्यास्तु पूर्ववत् ।। २७ ।। शून्य के देने वाले ग्रह पापफल देने वाले होते हैं और रेखा देने वाले ग्रह शुभफल देने वाले होते हैं। यदि ये अपने मूलत्रिकोणादि में हों तो पूर्ववत् त्रिगुणांदि फल देते हैं।।२७।। शत्रुनीचाधि शत्रूणां स्थानेष्वपि तु पूर्ववत् । राशिं हित्वा तु भावानां सर्वत्रैवं क्रिया भवेत् ।। २८ ।। जहां आयुष्य का विचार हो वहां राशि को छोड़कर अंशादि से जैसा संस्कार कहा हो वैसा करना, यह क्रिया सर्वत्र जानना।।२८।। भावानां संस्कार विशेषाद् फल विचारः- द्वितीयभावलिप्ताश्च राशिलिप्ताविभाजिताः । स्ववर्गणाहतास्तस्य खेटानां वर्गणाहताः ।।२९।। दूसरे भाव के अंशादि का कला करके उसमें दूसरे भाव की राशि के कला