बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६५८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । चन्द्रमा से चतुर्थ भाव में माता, गृह और ग्राम का विचार करना चाहिये। चन्द्रमा के अष्टकवर्ग में जिस राशि में अधिक शून्य है।।२१।। तं राशिं च परित्यज्य शुभकर्माणि कारयेत् । चन्द्राष्टमे शनिक्षेत्रे त्रिकोणेषु विशेषतः ॥२२॥ उस राशि में जब चन्द्रमा हो तब शुभ कर्म को न करे। चन्द्रमा से आठवें शनि की राशि से विशेष कर त्रिकोण में हों तो।।२२।। आधिव्याधिदुःखान्यपि लभते नात्र संशयः । चन्द्रात्सुखफलात्पिंडं वर्धयेद्धैर्हृतं चतत् ॥२३॥ उस समय जातक को मानसिक कष्ट, व्याधि और दुःख होता है। चन्द्रमा से चौथे भाव के फल को खंड (पिंड) से गुणा कर २७ से भाग देने से।।२३।। शेषमृक्षे शनौ याते मातृहानिं विनिर्दिशेत् । तत्रिकोणेषु वा केचिद्दशाच्छिद्रेषु कल्पयेत् ॥२४॥ जो शेष हो तत्तुल्य नक्षत्र पर शनि के रहने से माता को कष्ट या मृत्यु होती है। अथवा उस नक्षत्र से त्रिकोण नक्षत्र (१० या १९ नक्षत्र में) में शनि के रहने से और उस समय कष्टप्रद दशा के रहने से माता की मृत्यु होती है।।२४।। भौमाष्टकवर्गफलम् – भौमाष्टवर्गे संचिन्त्यं भ्रातृविक्रमधैर्यकम् । भौमस्थितस्य सहजोराशिर्भ्रातृगृहंस्मृतम् ॥२५॥ भौमाष्टक में भाई, पराक्रम और धैर्य का विचार करना चाहिये। भौम से तीसरे भाव से भाई का विचार करना चाहिये।।२५।। त्रिकोण शोधनं कृत्वा यत्रभूयांसि तत्रवै । भूमिर्भवति भार्यवा भ्रातृगेहसुखं तथा ॥२६॥ भौमाष्टकवर्ग में त्रिकोण शोधन के पश्चात् जिस राशि में अधिक शेष हो उस राशि में जब भौम जाता है तो भूमि का स्त्री का लाभ और भाई तथा गृह का सुख होता है।।२६।। भौमो बलविहीनश्चेत् दीर्घायुर्भातृकोभवेत् । फलानि यत्र क्षीयन्ते तत्रभूमिहानिः स्मृतः ॥२७॥