बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टकवर्गफलाध्यायः । ६५७ है। पिता के जन्मलग्न से १०वीं राशि में जन्म हो तो पिता के गुण के सदृश गुणवाला होता है।।१६।। तदीशे लग्नसंस्थेऽपि पितृश्रेष्ठो भवेत्सुतः । एवमादिफलं ज्ञात्वा तान्यत्रापि नियोजयेत् ।।१७।। और उसके स्वामी यदि जन्मलग्न में हों तो पिता से श्रेष्ठ होता है। इस प्रकार से पूर्वोक्त के फलों की योजना यहां भी करना।।१७।। विशेषः- सूर्याष्टवर्गे यच्छून्यं तन्मासे संवत्सरेऽपि च । विवाहव्रतबंधादि सर्वं तत्वर्जयेत्सदा ।।१८।। सूर्याष्टक वर्ग में जिस राशि में अधिक शून्य हो उस राशि के मास में और संवत्सर (उस राशि में जब गुरुहों) में विवाह व्रत-वधादि शुभकर्म को न करें।।१८।। कलहो त्रासदुःखानि शून्यमासे भवन्ति च । एवमादिफलं ज्ञात्वा मासं प्रति समाचरेत् ।।१९।। अधिक शून्य वाले मास में कलह, भय, दुःखादि होते हैं इसको ध्यान में रखते हुये मास के कार्यों को करे।।१९।। पितृ मरणकालः- संशोध्यपिंडं सूर्यस्य रंध्रमानेन वर्द्धयेत् । अर्कोद्धतावशेषर्क्षे यदा याति शनैश्चरः । तस्मिन्मासे मृतिं विद्यात्तत्रिकोणगतेऽपिवा ।।२०।। सूर्य के अष्टकवर्ग के पिंड को सूर्य के शून्य संख्या से गुणकर १२ का भाग देने से जो शेष बचे उस राशि में जब शनि जाता है तब उस राशि के मास में पिता की मृत्यु होती है या उस राशि से त्रिकोण राशि में जब शनि जाते हैं तब पिता की मृत्यु होती है।।२०।। चन्द्राष्टकवर्गस्य फलम् - चन्द्राच्चतुर्थभे मातुः प्रासादग्रामचिंतनम् । चन्द्राष्टवर्गेयद्राशौ शून्याधिक्यं प्रजायते ।।२१।।