बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
पृष्ठ 689, कुल 800 में से
संदर्भ में पढ़ें: अथ नवमोऽध्यायः । ६७७ स्वोच्चमित्र स्ववर्गस्था एवमर्थाश्च सप्ततिः । नीचारिवर्गाश्चान्यत्पुष्टंचापुष्टमेव च ॥७॥ यदि ग्रह मित्र, उच्च स्वक्षेत्र या षड्वर्ग में हों तो पूर्वोक्त सभी फल उत्तम होते हैं और यदि शत्रु, नीच शत्रुवर्गादि में हो तो अशुभ फल दायक होता है॥७॥ अथ ग्रहात् भाव विचारः। रविः शरीरे होरायां स्वे च भ्रातरि वेश्मनि । सुते व्याधौ क्षते शत्रौ मृतौ तपसि कर्मणि ॥८॥ सूर्य शरीर, लग्न, दूसरे भाव में तीसरे भाव में, चौथे घर में, पुत्र भाव में रोग विचार में, क्षत विचार में, मृत्यु और नवम के विचार में, कर्म के विचार में, दशम॥८॥ आये व्यये फलं दद्यात् शीतगुविक्रमे सुखे । कुटुम्बे भ्रातरिक्रोधे प्रतिभायां शुभे मृतौ ॥९॥ भाग्ये त्रिकोणे व्यापारे लाभे रिःफे फलप्रदः । आय और व्यय के विचार में फल देता है। चन्द्रमा प्रताप, कुटुम्ब, पोस्यवर्ग, भाई, क्रोध, बुद्धि, विशेषकर्म भाग्य, पंचम नवम भाव विचार और क्रयविक्रयादि और लाभ व्यय के विचार में फल देता है॥९॥ कुजः शरीरे होरायां कल्पविक्रमवंधुषु । सहजे च सहे शत्रौ क्रोधे लोभे च रंध्रके ॥१०॥ क्रियायायतौ हानौ जये भंगे फलप्रदः ॥११॥ मङ्गल से होरा कल्पशास्त्र, प्रताप, भाई, सहज, शत्रु, लोभ अष्टमभाव, कर्म, प्रभाव, हानि, उत्कर्ष और पतन का विचार करे॥१०-११॥ बुधो मनसि विद्यायां बुद्धौ हिंबुक वेश्मनि । लोभे शिल्पे च गानादिप्रिये स्वेलाभरिःफयोः ॥१२॥ बुध मानसिक विचार में विद्या, चतुर्थभाव, लोभ, शिल्प, गान-विद्या ग्यारहवे और बारहवें भाव के विचार में फल देता हैं॥१२॥ गुरुकर्मे च तपसि त्रित्रिकोणे त्रिकोणके । आज्ञायां च सुते हानौ कारागृहनिवेशने ॥१३॥ गुरु धर्म, तप नवम पंचम, आज्ञा, पुत्र, हानि, कारागार प्रवेश॥१३॥