भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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पृष्ठ 718

७०६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । उभये मध्यमेऽन्ते च आदावेवं प्रकीर्त्तिताः । तथा द्विस्वभाव राशि हो तो मध्य, अंत और आदि में भाग्य का फल होता है। भावानांविशेषविचारः- भावानां चैव सर्वेषां चन्द्रलग्नात्तु लग्नतः ।।४४।। सभी भावों का विचार चन्द्रलग्न से और जन्मलग्न से करना चाहिये ।।४४।। अंशदायोक्तवत्कृत्वा शुभपापदृगाहतम् । षष्ठ्याप्तं तद्दलाप्तं स्याद् भावादीनां च संख्यका ।।४५।। पहले अंशायुदाय के अनुसार गणित करके जो फल आवे उसे दो जगह रखकर एक जगह शुभ दृष्टि योग से और दूसरे स्थान में पापदृष्टि योग से गुणाकर दोनों स्थान में ६० से भाग देना जो फल प्राप्त हो वह भाव प्राप्त होता है।।४५।। रश्मिघ्नं च वलाप्तं च त्वनिष्ठमपवादनम् ।।४६।। फिर उसी अंशायु गणित को रश्मि से गुणाकर इस बल से भाग देने से अनिष्ट और शुभ फल होता है।।४६।। इति पाराशरहोरायामुत्तरार्धे भाग्यफलाध्यायत्रयोदशः।।१३।। अथ चतुर्दशोऽध्यायः । मुहूर्तलक्षणम् - नाडीद्वयं मुहूर्तः स्याद्दिनाडीद्वयमेव च । रवेरुदयतो ह्येषाक्रमात्सर्वजितः स्मृतः ।।१।। दो घटिका का एक मुहूर्त होता है किन्तु जब दिनमान ३० घटी का होता है तब अन्यथा २ घटी से कम या अधिक भी होता है। प्रातः काल सूर्य जिस राशि पर उदय हो वही लग्न होता है वहाँ से आरम्भ कर मेषादि क्रम से लग्न बीतती हैं। दिन में १५ मुहूर्त और रात्रि में १५ मुहूर्त होते हैं।।१।। आर्द्रश्लेषानुराधाश्च मघाश्चार्थ घनिष्ठिकाः । उत्तराषाढ़संज्ञश्च सर्वजिद्रोहिणी तथा ।।२।। दिन के १५ मुहूर्त क्रम से आर्द्रा, आश्लेषा, अनुराधा, मघा, धनिष्ठा, उत्तराषाढ़ा, सर्वजित् नाम का अभिजित्, रोहिणी।।२।।