बृहत्संहिता (आचार्य वराहमिहिर - स्थापत्य, खगोल, मौसम व जल विज्ञान)

बृहत्संहिता (आचार्य वराहमिहिर - स्थापत्य, खगोल, मौसम व जल विज्ञान)
Brihat Samhita of Varahamihira with Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर / डॉ. सुरेशचन्द्र शास्त्री द्वारा
DevanagariHindipublished1,105 पृष्ठ
पृष्ठ 831, कुल 1105 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 831
10
| Adhyaya | Sloka | Adhyaya | Sloka | ||
|---|---|---|---|---|---|
| करिवृषरथौघ | lxviii | 95 | काकपदमक्षि | lxxx | 15 |
| करेणकर्मसिद्धयः | lxxi | 4 | काकेतिविघातः | xcv | 53 |
| करेतिकलहं | xcv | 51 | काकोदुम्बरिकायां | liv | 19 |
| कर्कणिकोद्रवकदली | xli | 4 | काञ्चीकलापनूपुरगुरु | xlviii | 14 |
| कर्कण्यर्कमधुगन्धतैल | xlii | 5 | काठिन्यंयाति | xxi | 36 |
| कर्पूरचोलमलैः | lxxvii | 14 | काणेनाक्षणादक्षिणे | xcvi | 12 |
| कर्णयुग्ममंपियुक्त | lxx | 9 | काद्यास्तुवर्गाः | xcvi | 15 |
| कर्णाटमहाट | xiv | 13 | कापोतारुण | v | 56 |
| कर्णोपान्तःकार्योऽर्ध | lviii | 7 | कामंप्रदीपयति | lxxvii | 35 |
| कर्तुरनुकूलदिवसे | lix | 1 | कामिनींप्रथम | lxxiv | 18 |
| कर्पूरस्फटिक | lxxxi | 28 | काम्बोजचीनयवनान् | v | 80 |
| कर्बुरकोऽहिःपुरुषेकृष्णा | liv | 42 | कार्त्तिकेऽश्वयुजि | vii | 18 |
| कर्मप्राप्तिर्दशमेऽर्थक्षयश्च | civ | 45 | कार्त्तिक्यामन | v | 69 |
| कर्मसङ्गमयुद्धेषुप्रवेशे | lxxxvi | 47 | कार्मुकमृगघट | xl | 14 |
| कर्माङ्गलथवाष्टक | lxxix | 8 | कार्मुकरूपेषुद्वानियन्त्रतु | iv | 12 |
| कर्पकपाखण्डि | v | 29 | कार्यंतूमूलशकुनेऽन्तरजे | xcv | 60 |
| कलत्रकलहाक्षिरुग्जठर | civ | 16 | कार्यंपौष्टिकमौषधादि | c | 5 |
| कलशमृणाल | lxviii | 46 | कार्यस्यव्याघातस्तुणकूटे | xcv | 36 |
| कलशेप्वेतान् | xliv | 11 | कार्याचतुर्भुजाया | lviii | 38 |
| कलशोदकेषु | xliv | 20 | कार्यातुकेश | lviii | 13 |
| कलहस्वरदीप्तेषुस्थान | lxxxvi | 63 | कार्योऽष्टभुजोभगवान् | lviii | 31 |
| कलहोनैर्ऋत | lxxxvii | 35 | कालकधुन्धुक | lxxix | 37 |
| कलास्वभिज्ञः | lxix | 36 | कालकसंशंकृष्णं | lxxix | 35 |
| कलिङ्गवङ्गान्मगधान् | v | 79 | कालोद्भवैः | xii | 16 |
| कलुषंकटुकंलवणंविरसं | liv | 122 | काकियुगन्धरपौरव | xxxii | 19 |
| कलुषामन्तद्युतयोलेखा | lxxxii | 4 | काश्मीरकान् | v | 70 |
| कल्माषबभ्रुकपिला | xxx | 12 | काभीरान् | v | 78 |
| कर्विसप्तजिलं | xliii | 55 | किञ्चिदधऊर्ध्व | xliii | 48 |
| कष्टःप्लवङ्गोबहुशः | viii | 44 | किन्वन्निलदहन | xxxii | 7 |
| काइतिकाकस्यरुतं | xcv | 50 | किमपिकिलभूतमभव | liii | 2 |
| काकद्वयस्यापि | xcv | 57 | किंवातःपरमन्यच्छस्त्र | xxi | 4 |