भारतकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

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7 अहो! पुरुष-शंसित (= नराशंस) तथागत शीघ्रता से निर्वाण की ओर जा रहे हैं, जैसे फटे- पुराने वस्त्रवाले, जाड़े से ठिठुरे हुए लोगों के लिए आग तेजी से बुझ रही हो। 8 पापों (= दोष) के महावन में भटके हुए शरीरधारी प्राणियों को मार्ग बतलाकर, पथ-प्रदर्शक अकस्मात् ही अदृश्य हो रहा है। 9 प्यास से पीड़ित मनुष्य लम्बे मार्ग पर चल रहे हैं और तब उनके मार्ग में स्थित शीतल जल का जलाशय हठात् ही सूख रहा है। 10 नीली पपिनयोंवाला निर्मल लोक-चक्षु, जो भूत वर्तमान एवं भविष्य को देखता है और जो ज्ञान से विकसित है, अब बन्द होने को है।⁸⁷ 11 अवश्य ही सूख रही लगी फसल के ऊपर जल बरसाकर बादल दूर हो रहा है (= √मज्ज)। 12 अज्ञानरूप अन्धकार के कारण मार्ग-भ्रष्ट प्राणियों के लिए चारों ओर चमकनेवाला प्रकाश अत्यन्त अकस्मात् ही शान्त हो रहा है।” 13 तब आनन्द के चित्त को शोकाकुल देखकर तत्त्वज्ञ-श्रेष्ठ ने, जो सान्त्वना देनेवालों में प्रधान थे, उसके लिए तत्त्व की व्याख्या की:– 14 “पहचानो, आनन्द, जगत् के वास्तविक स्वभाव को और शोक न करो। क्योंकि यह जगत् समष्टि है और इसलिए संस्कृत (उत्पन्न) होने के कारण अनित्य है। 15 मैंने पहले ही तुम्हें कहा है कि द्वन्द्वों में आनन्द पानेवाले प्राणियों को तुम्हें अत्यन्त स्नेह-रहित (?) अनुकम्पा के साथ देखना चाहिए। 16 जो कुछ उत्पन्न है वह संस्कृत और अनित्य है, किसी सहारे पर आश्रित होने के कारण इसे अपना आश्रय नहीं है। तब किसी के लिए भी नित्यत्व प्राप्त करना शक्य नहीं है।⁸⁸ 17 यदि पृथ्वी के प्राणी नित्य (स्थायी) होते तो, तो जीवन (= प्रवृत्ति) परिवर्तनशील नहीं होता; और तब मुक्ति (निर्वाण) की भी क्या जरूरत होती? क्योंकि अन्त वैसा ही होता जैसा कि आरम्भ। 18 या मेरे लिए तुम्हारी तथा अन्य लोगों की यह अभिलाषा ही क्या? . . .। 19 मैंने सम्पूर्ण मार्ग तुम्हें दृढ़तापूर्वक बतला दिया है। तुम्हें तथा (दूसरे) शिष्यों को समझना चाहिए कि बुद्ध कुछ छिपाते नहीं। 20 चाहे मैं रहूँ या निर्वाण प्राप्त करूँ, एक ही बात है, वह यह कि तथागत धर्म की मूर्ति (= धर्मकाय) हैं; यह मर्त्य शरीर किस काम का? ⁸⁷- “जो ज्ञान से विकसित है” इसकी जगह चीनी अनुवाद में है “जो प्रज्ञा द्वारा अन्धकार को दूर करता है”। ⁸⁸- “किसी नहीं है” की जगह चीनी अनुवाद में है “यह दीनतापूर्वक किसी सहारे पर आश्रित है।” 21 क्योंकि मेरे जाने के समय संवेग व अप्रमाद द्वारा पूर्ण श्रद्धा पूर्वक मेरा प्रदीप जलाया गया है, इसलिए धर्म का प्रकाश हमेशा रहेगा। 22 इसे अपना प्रदीप समझकर तुम्हें इसमें दृढ़ उत्साह के साथ लगना चाहिए; और निर्द्वन्द्व होकर अपना लक्ष्य (= स्वार्थ) पहचानो तथा अपने मन को दूसरी बातों का शिकार मत होने दो। 23 तुम्हें जानना चाहिए कि धर्म-प्रदीप है प्रज्ञा-प्रदीप, जिसके द्वारा चतुर व विद्वान् पुरुष अज्ञान दूर करता है, जैसे कि प्रदीप अन्धकार (दूर करता है)। 24 परम श्रेय प्राप्त करने के चार क्षेत्र (= गोचर) हैं—शरीर, वेदना, चित्त और अनात्मता। 25 अस्थि, चर्म, रक्त, स्नायु, मांस केश आदि से भरे इसे शरीर में गन्दगी देखनेवाले को शरीर के प्रति आसक्ति नहीं होती। 26 वेदनाएँ दुःख हैं और प्रत्येक वेदना भिन्न भिन्न कारणों से उत्पन्न होती है, ऐसा जो देखता है वह सुख के भाव (= सञ्ज्ञा) को जीत लेता है। 27 जो शान्त चित्त से (मानसिक) धर्मों की उत्पत्ति स्थिति व क्षय को देखता है, वह कुदृष्टि को ग्रहण नहीं कर सकता। 28 स्कन्धों की उत्पत्ति कारणों से होती है, ऐसा जो देखता है उसके लिए “अहं” में विश्वास (श्रद्धा) पैदा करनेवाला आत्मभाव बन्द हो जाता है। 29 दुःख अन्त करने का यही एक मार्ग है; इन चारों के बारे में उसी प्रकार (धर्म-) मार्ग पर सावधान रहो। 30 उसी तरह, मेरे उस पार चले जानेपर, जो लोग इस पर स्थित रहेंगे, वे उत्तम अहार्य एवं नैष्ठिक पद प्राप्त करेंगे।” 31 इस तरह विनायक ने आनन्द को उपदेश दिया; और यह समाचार सुनकर, बुद्ध की भक्ति से लिच्छवि वहाँ दौड़े आये। 32 दया एवं मुनि-भक्ति के कारण उनके चित्त संताप से अभिभूत हुए और यह समाचार सुनकर, उन्होंने तुरत उन कार्यों को, जिनमें वे व्यस्त थे, तथा साधारण आडम्बर (= ऋद्धि) को छोड़ दिया। 33 गुरु से बोलने की इच्छा से वे उन्हें प्रणाम करके एक ओर खड़े हो गये और उनकी बोलने की इच्छा जानकर गुरु ने उन्हें यों कहा– 34 “मेरे प्रति तुम लोगों के चित्त में जो कुछ हो रहा है वह सब मैं जानता हूँ; तुम लोग वही होते हुए भी मानो शोक से बदलकर अब.......। 35 लक्ष्मी के साथ रहते हुए भी तुम लोगों में बाहरी दीप्ति और धर्म का ज्ञान दोनों विद्यमान हैं। 36 यदि मुझसे कुछ सुनकर तुम लोगों ने ज्ञान प्राप्त किया है, तो अपने को शान्त करो और मेरे चले जाने (= व्यय) से दुःखी मत होओ। 104 अश्वघोष

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