बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
पृष्ठ 112, कुल 122 में से
संदर्भ में पढ़ें64 इसलिए अपने भावों को सम तथा चित्त को नियन्त्रित रखते हुए संसार के उदय और व्यय को जानो और समाधि का अभ्यास करो। क्योंकि जिसने मानसिक समाधि प्राप्त कर ली है उसे कोई आधियाँ स्पर्श नहीं करतीं। 65 जैसे बढ़ते हुए पानी को रोकने के लिए मनुष्य परिश्रमपूर्वक बाँध बनाते हैं, वैसे ही समाधि को उस बाँध के समान बताते हैं जिसके द्वारा विचाररूपी जल स्थिर किया जाता है। 66 उस बुद्धिमान् मनुष्य (= प्राज्ञ) का, जो सदा अपनी सम्पत्ति (ऐश्वर्य) दान करता है और हृदय से अत्यन्त धर्माभिमुख रहता है, त्राण होता है; फिर उस भिक्षु के त्राण का क्या कहना, जिसे घर भी नहीं है। 67 प्रज्ञा, जरा-मरणरूपी महासागर में एक नौका है, मोहान्धकार में मानो एक प्रदीप है, सब व्याधियों को दूर करनेवाली ओषधि है, दोषरूपी वृक्षों को काटनेवाली तेज कुल्हाड़ी है। 68 इसलिए प्रज्ञा की वृद्धि के लिए विद्या, ज्ञान और भावना का अभ्यास करो; क्योंकि जिसे प्रज्ञा-चक्षु है, उसे ही वास्तविक दृष्टि है, यद्यपि उस चक्षु में (स्थूल पदार्थों को) देखने की शक्ति नहीं होती।⁹⁷ 69 घर छोड़नेपर भी यदि कोई मनुष्य चित्त के विविध व्यापारों में लगा रहे तो उसका त्राण नहीं होता; जो लोग परम शम प्राप्त करना चाहें वे इसे जानें और सब व्यापारों से मुक्त हो जायें। 70 इसलिए अप्रमाद में वैसे ही लगो जैसे कि गुरु में और प्रमाद का वैसे ही परित्याग करो जैसे कि शत्रु का। अप्रमाद द्वारा इन्द्र ने राज्य प्राप्त किया और प्रमाद द्वारा उद्धत असुरों ने विनाश।⁹⁸ 71 करुणामय, सहानुभूतिपूर्ण एवं हितैषी गुरु को जो कुछ करना चाहिए वह सब मैंने किया; अब अपने को लगाओ और चित्त को शान्त करो। 72 तब, जहाँ कहीं रहो, पर्वतपर या शून्य भवन में या जङ्गल में, धर्माचरण में सदा प्रयत्नशील (अप्रमत्त) रहो और पश्चाताप न करो। 73 रोगियों की शारीरिक अवस्थाओं का पूरा-पूरा विचारकर, उन्हें उचित ओषधि बताना वैद्य का काम है; किन्तु उचित समय पर ओषधि-सेवन का उत्तरदायित्व रोगी पर ही है, न कि वैद्य पर। 74 पथ-प्रदर्शक (= देशिक) द्वारा उत्तम सीधा समतल एवं निरापद मार्ग बताये जानेपर, यदि सुननेवाले उसपर नहीं चलें और विनाश को प्राप्त हों, तो पथ-प्रदर्शक के ऊपर आदेशरूपी ऋण शेष नही रहता।
75 तुम लोगों में जिस किसी को दुःख आदि चार सत्यों के मेरे उपदेश के बारे में (कुछ भी जानने की) इच्छा हो, वह तुरन्त मुझसे विश्वासपूर्वक कहे और अपना संशय दूर करे।” 76 महामुनि द्वारा इस तरह जोरों से कहे जानेपर वे सब संशय-रहित थे और वे कुछ नहीं बोले। तब अपने चित्त से उनके चित्तों में प्रवेशकर, साधु (= कृती) अनिरुद्ध ने ये वचन कहे:— 77 “हवा का बहना बन्द हो जाय, सूरज सीतल हो जाय और चाँद गर्म, तो भी जगत् में चार सत्त्वों को मिथ्या प्रमाणित करना शक्य नही। 78 जिसे दुःख कहा गया है वह सुख नही; दुःख के कारण को छोड़कर दुःख पैदा करनेवाला दूसरा कुछ नही; कारण का निरोध होने से मुक्ति अवश्य होती है और (-निरोध) मार्ग ही उपाय है। 79 इसलिए, हे महात्मन्, चार सत्यों के बारे में शिष्यों को कुछ संशय नही है; किन्तु जिन्होंने अपना लक्ष्य सिद्ध नही किया है वे यह सोचकर दुःखी हो रहे हैं कि विनायक जा रहे हैं। 80 इस सभा में, जिसने नये व्रत (नई दीक्षा) के कारण अपने लक्ष्य को नही देखा था, वह भी आज आपके इस उपदेश से अपने सम्पूर्ण लक्ष्य को वैसे ही देख रहा है जैसे कि बिजली की चमक में (देख रहा हो)। 81 किन्तु वे भी, जिन्हें कुछ भी करना शेष नही है और जो भवसागर के उस पार चले गये हैं, यह सुनकर हृदय से चिन्तित हो रहे हैं कि पूर्ण शास्ता विदा हो रहे हैं।” 82 आर्य अनिरुद्ध के ये वचन सुनकर बुद्ध ने, असलियत को जानते हुए भी, इसे फिर से सुना और अपने शिष्यों के चित्त दृढ़ करने के लिए उनसे स्नेहपूर्वक कहा:— 83 “युगपर्यन्त रहनेपर भी प्राणी का विनाश होता ही है, इसलिए पारस्परिक संयोग या मिलन जैसी कोई (स्थायी) वस्तु नही है। मैंने अपना और दूसरों का काम पूरा कर लिया है, अब और जीवित रहने में कोई लाभ नही है। 84 स्वर्ग में और पृथ्वी पर जिन्हें दीक्षित करना था वे सब बचाये गये और मार्गपर लाये गये (स्रोत-आपन्न किये गये)। इसके बाद मेरा यह धर्म भिक्षुओं की वंश-परम्परा से मनुष्यों के बीच रहेगा। 85 जगत् के वास्तविक स्वभाव का पहचानो और चिन्तित मत होओ; क्योंकि वियोग अवश्यम्भावी है। संसार को ऐसा जानकर वैसा यत्न करो जिससे यह फिर कभी न हो। 86 जब ज्ञानरूपी प्रदीप से अन्धकार में प्रकाश हो जाता है और भवों को असार देख लिया जाता है, तब आयु का निरोध होनेपर वैसे ही संतोष होता है, जैसे कि रोगों के दूर होनेपर। 87 जब द्वन्द्वों सहित छूटनेवाले शरीर नामक भव-सागर की धारा कट रही हो, तब जीवन का अन्त होनेपर, जैसे कि विपत्ति-प्रद शत्रुओं का नाश होनेपर, किसे आनन्द न होगा।
⁹⁷ - “प्रज्ञामयं यस्य हि नास्ति चक्षुश्चक्षुर्न तस्यास्ति सचक्षुषोऽपि”—सौन्दरनन्द 18.35 ⁹⁸ - “अप्रमाद से ही इन्द्र देवताओं में श्रेष्ठ बना”—धम्मपद, 2.10
112 अश्वघोष