बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें6 जीवलोक, जिसकी आँखें मोह से अवश्य ही अन्धी हो गई हैं, इन नेता से वञ्चित हुआ, जिनकी प्रज्ञा विशुद्ध थी और जिन्हें उत्तम दृष्टि प्राप्त थी; और होश खोकर यह लोक कुमार्ग में स्थित है।” 7 तब मुनि का निर्वाण होनेपर अनिरुद्ध ने, जिसने संसार को जीत लिया था, जिसकी आसक्ति नष्ट हो गई थी और जिसने जन्म-निरोध कर लिया था, जगत् को प्रकाश से वञ्चित हुआ देखकर, शान्तिपूर्वक यों कहा:- 8 “संस्कारों के अधीन रहनेवाले बुद्धिमान् मनुष्य को इस समय विश्वास नही करना चाहिए, जब कि ऋषिरूपी महापर्वत पर अनित्यता रूपी वज्र के गिरने से चोट पड़ी है। 9 अहो! इस असार अनात्म एवं विनाशधर्मा जगत् को जीवलोक कहते हैं, जिसमें मुनि-दुर्धर्ष सिंह-दोषरूपी हाथियों को नष्ट करके स्वयं नाश को प्राप्त हुए। 10 जगत् सदा कर्मशील और कामासक्त है; अब किसका हाथ सुरक्षा प्रदान करेगा, जब कि तथागत भी साधारण भाग्य के अधीन होकर सुवर्ण-स्तम्भ के समान गिर पड़े? 11 मुनिरूपी हाथी ने दोषरूपी वृक्ष को-जिसके बीज छः हैं, अङ्कुर एक, बलि एक, मूल छः, फल पाँच, शाखाएँ दो, . ., और तना एक-उखाड़ डाला; तो भी वह यहाँ पड़े हुए हैं। 12 सम्राट के समान सभी शत्रुओं को जीतकर, ग्रीष्म ऋतु में मोर के समान आसक्ति-रहित होकर, घोड़े के समान अपनी यात्रा पूरी कर, (इन्धन-रहित) अग्नि के समान जन्म-मुक्त होकर, मुनि शान्ति को प्राप्त हुए। 13 जैसे कि वज्र-चालक स्वर्ग-पति प्रसन्न होकर तृप्ति-कर जल-धाराएँ भेजता है, वैसे ही गुरु ने अपने उपदेश भेजे और प्रखर दीप्ति से पीड़ित वृषभ के समान पृथ्वी पर घूमते हुए उन्होंने अपने यश से दिशाओं को व्याप्त किया; तो भी वह यहाँ पड़े हुए हैं। 14 वह नर-सूर्य द्रविण-पति वैश्रवण के दल से परिवृत होकर अपने मार्गपर चले, और उन यशस्वी और तेजस्वी ने नदी (=सिन्धु) के समान सुवर्ण-राशि दी, तो भी उनका अस्त हुआ। 15 आज मुनि का निर्वाण होनेपर जगत् वैसे ही निष्प्रभ है जैसे कि कुहासे से भरी दिशाएँ, जैसे कि सूरज जिसकी किरणें बादलों से कट रही हों, जैसे कि आहुति पूरी होनेपर घी-रहित आग। 16 कुटिलता (= ग्रन्थि)-रहित होकर उन्होंने सत्य का (सीधा) मार्ग ग्रहण किया और बन्धन (= ग्रन्थि)-रहित होकर उन्होंने शम-धर्म प्राप्त किया। ऋद्धि द्वारा जीवन-धारण करने में समर्थ होनेपर भी उन्होंने शरीर नामक दुःख-निवास का परित्याग किया। 17 जैसे सूर्य अन्धकार को दूर करता है, वैसे ही अज्ञान को जीतकर और जैसे जल-धारा धूल को शान्त करती है, वैसे ही काम को शान्तकर, मुनि......चले गये, घूमते हुए दुःख-चक्र में फिर कभी लौटने को नही।
18 जन्मरूपी दुःख को नष्ट करने के लिए उनका जन्म हुआ था, शान्ति के लिए जगत् उनकी शरण में आया, वह उज्ज्वल तेज से चमके और उन्होंने विशिष्ट बुद्धि से प्रकाशित किया। 19 उन्होंने लोगों को श्रेय की ओर भेजा, उन्होंने पृथ्वी को अपने उत्तम गुणों से व्याप्त किया, उनके यश में वृद्धि हुई।¹⁰⁰ 20 अपनी विपुल विद्या के कारण वह निन्दा सुनकर उदास नही होते थे, वह दुखियों से दयापूर्वक बोलते थे, वह दूषित भोजन ग्रहण नही करते थे और अच्छा भोजन पाकर उन्हें आनन्द नही होता था। 21 वह अपनी चञ्चल इन्द्रियों को शान्त रखते थे और अपनी मानसिक शक्ति (इच्छा-शक्ति) के कारण ठीक ही विषयासक्त नही होते थे। दूसरों द्वारा अप्राप्त मार्ग को पाकर उन रसज्ञ ने नैष्क्रम्य-रस का आस्वादन किया। 22 उन्होंने वह दिया, जो पहले किसी मनुष्य ने नही दिया था और उनके दान, फल की इच्छा से प्रेरित नही होते थे; उन्होंने अविचल चित्त से राज्य छोड़ा और अपने गुणों से सज्जनों के चित्त आकृष्ट किये। 23 उन्होंने दृढ़तापूर्वक अपनी चञ्चल आँखों की रक्षा की। वह सदाचार द्वारा अपने चित्त की रक्षा किया करते थे। उन्होंने श्रेय की रक्षा एवं वृद्धि की। उन्हें किसी उत्पन्न धर्म (वस्तु) की अभिलाषा नही हुई। 24 बुरे कर्मों को बुरा समझकर उन्होंने छोड़ दिया और श्रेय द्वारा दोषरूपी शत्रुओं से अपने को मुक्त किया। उन्होंने बुद्धि द्वारा पापों को सर्वथा उन्मूलित किया, तो भी वह (मुनि), अनार्य अनित्यता के वशीभूत हुए। 25 उन्होंने ठीक-ठीक धर्म का पालन किया और आनन्दपूर्वक उत्तम निश्चय ग्रहण किये; तो भी वह शास्ता, जिन्हें ज्ञान का खजाना था, उस अग्नि के समान शान्त हो गये, जिनका इन्धनरूपी कोष समाप्त (उपभुक्त) हो गया हो। 26 गुरु वहाँ पड़े हुए हैं, जिन्होंने आठ के बारे में पाँच के समूह को अच्छी तरह जीता, जिन्होंने तीन को देखा, जिन्होंने त्रिविध आचरणों का अन्त किया, जिन्हें त्रिविधि दृष्टि थी, जिन्होंने एक की रक्षा की, जिन्होंने एक को प्राप्त किया, जिन्होंने एक का चिन्तन किया, जिन्होंने सात भारी चीजों (= गुरूणि ?) का परित्याग किया। 27 उन्होंने शान्ति के लिए मार्ग को प्रकाशित किया और कृपापूर्वक सज्जनों को श्रद्धावान् बनाया। उन्होंने पापरूपी वृक्षों को काटा और श्रद्धावानों को भवों से मुक्त किया।
¹⁰⁰ _ अर्थ अनिश्चित है।
114 अश्वघोष