बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें49 सुगत को खोकर संसार, सारथि द्वारा परित्यक्त रथ के समान, या कर्णधार द्वारा परित्यक्त नाव के समान या सेनापति द्वारा परित्यक्त सेना के समान, या नायक द्वारा परित्यक्त काफ़िले (=सार्थ) के समान, या वैद्य द्वारा परित्यक्त रोगी के समान है। 50 आज निर्वाण चाहनेवालों का दुःख वैसे ही है जैसे कि शरद् ऋतु में बिना बादल का आसमान जो चाँद से सूना हो, जैसे कि आकाश जिसमें हवा नहीं बह रही हो, जैसे कि उन लोगों का दुःख जो जीवित रहना चाहते हों (किन्तु मर रहे हों)।” 51 यद्यपि वह अर्हत् था, जिसने अपना अच्छा काम पूरा कर लिया था, तो भी जन्म (जीवन, संसार) की बुराइयों तथा गुरु के गुणों के बारे में उसने बहुत कुछ कहा; क्योंकि वह गुरु के प्रति कृतज्ञ था। 52 जो निष्काम नहीं हुए थे उन्होंने आँसू बहाये और भिक्षुओं ने धैर्य खोकर शोक किया; किन्तु जिनका (भव-) चक्र पूरा हो गया था उन्होंने सोचा कि जगत् मरणशील (व्ययधर्मा, नाशवान्) है और वे आत्मसंयम से विचलित नहीं हुए। 53 तब समाचार सुनकर, मल्ल लोग विपत्ति के बोझ से दबे हुए यथासमय तेजी से निकल आये और बाज की शक्ति से अभिभूत बगलों के समान वे कष्टपूर्वक बोले, “हा! त्राता!” 54 जब उन्होंने मुनि को प्रकाश-रहित सूर्य के समान वहाँ पड़ा हुआ देखा, तब मन के महा- अन्धकार के कारण वे रोये और भक्ति-वश ऊँचे स्वर से उन्होंने विलाप किया, जैसे सिंह के द्वारा गवांमति के मारे जानेपर गाय-बैल (रोते बिलखते हैं) 55 धर्म-गुरु का निर्वाण होनेपर जिन लोगों की आँखें आँसुओं से अभिभूत थीं और जो लोग अपने अपने विश्वास (पंथ) एवं स्वभाव के अनुसार शोक कर रहे थे, उनमें एक अत्यन्त तेजस्वी एवं धर्म-रत पुरुष था, उसने ये वचन कहेः— 56 “जिन्होंने सोये हुए जगत् (जीव-लोक) को जगाया, अब वह अन्तिम शय्या पर पड़े हुए हैं। धर्म की मूर्ति, यह पताका, गिरी हुई है, जैसे कि उत्सव का अन्त होनेपर इन्द्र की पताका (गिर पड़ती है)। 57 तथागतरूपी सूर्य ने बुद्धत्वरूपी तेज से, उद्योगरूपी गर्मी से, और ज्ञानरूपी सहस्र किरणों से, अज्ञानरूपी अन्धकार को दूर किया; अब अस्त होकर इस (सूर्य) ने संसार में फिर अन्धकार फैला दिया। 58 अब जगत् का नेत्र निष्ठुरतापूर्वक बन्द हो गया, जिसने अतीत अनागत और वर्तमान को देखा; बाँध निष्ठुरतापूर्वक टूट गया, जिसने दुःखरूपी महासागर की .... तरङ्गों से हमें बचाया।” 59 इस तरह वहाँ कुछ लोगों ने दीनतापूर्वक विलाप किया, दूसरों ने रथ के घोड़ों के समान झुककर शोक किया, कुछ लोग रोये, दूसरे भूमि पर पड़े रहे। प्रत्येक आदमी ने अपने स्वभाव के अनुसार आचरण किया। 60 तब रोते हुए मल्लों ने बड़े बड़े हाथियों की सूड़ों के सदृश भुजाओं से मुनि को यथासमय एक नई बहुमूल्य एवं सुवर्ण-खचित पालकी (=शिविका) पर रक्खा। 61 तब समयोचित विधि से उन्होंने भाँति भाँति की मनोहर मालाओं एवं अति उत्तम सुगन्धों से उनका सम्मान किया और फिर स्नेह एवं भक्ति से उन सबने पालकी पकड़ी। 62 तब कोमलाङ्गी कुमारियों ने, जिनके नूपुर बज रहे थे, अपने ताम्रवर्ण हाथों से उस (पालकी) के ऊपर एक बहुमूल्य वितान धारण किया, जो बिजली की चमक से उज्ज्वल बादल के समान जान पड़ा। 63 उसी प्रकार कुछ लोगों ने श्वेत मालाओं से युक्त छत्र पकड़े, और दूसरों ने सोने से मढ़े सफेद चँवर डुलाये। 64 तब वृषभ की-सी लाल आँखोंवाले मल्ल पालकी को धीरे-धीरे ले जाने लगे, और श्रुति-सुखद तूर्य आकाश में बजने लगे, जैसे वर्षा-ऋतु में बादल गरज रहे हों। 65 दिव्य कुसुम, कमल और भाँति-भाँति के फूल आसमान से गिरे, मानो दिग्गजों से प्रकम्पित चित्ररथ-वन के वृक्षों द्वारा (वे फूल) गिराये गये हों।$^{102}$ *66 ऐरावत से उत्पन्न बड़े-बड़े हाथियों ने मणिमय भीतरी भागवाले कमल और जल-कण-वर्षा... ...मन्दारव फूल बरसाये। *67 तब गन्धर्वों की रानियों ने, जिनके शरीर आनन्द-मुहूर्त के लिए उत्पन्न हुए थे, लाल चन्दन को मिटाकर, श्वेत वस्त्र फेंके, जो लीलापूर्वक सजाये गये थे। 68 चञ्चल पताकाओं को ऊपर उठाये हुए और सब प्रकार की मालाएँ चारों ओर बिखरते हुए, वे पालकी (=शिविका) को मङ्गल के लिए (=शिवाय) मङ्गलमय (=शिवेन) मार्ग से सङ्गीत के साथ-साथ ले गये। 69 मुनि की दिव्य (पारमार्थिक) शक्ति के कारण सौ-सौ बार प्रणाम करते हुए और उनकी मृत्यु पर रोते हुए, मल्लों ने भक्तिपूर्वक पालकी ढोई और इस प्रकार इसे वे नगर के मध्य भाग से ले गये। 70 नाग-द्वार से बाहर होकर उन्होंने हिरण्यवती नामक नदी पार की और मुकुट नामक चैत्य के नीचे उन्होंने उनके यश के अनुरूप एक चिता बनाई। $^{102}$. पाद 2-4 की तुलना सौन्दरनन्द दो 53 के पाद 2-4 से कीजिए- “...पुष्पवर्षं पपात खात्। दिग्वारणकराधूतान्नानाच्चैत्ररथादिव ॥” 116 अश्वघोष