भारतकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

पृष्ठ 31, कुल 122 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 31

यह अन्तर जानकर रात को निष्क्रमण करने की उसकी इच्छा हुई। तब उसका मन जानकर देवों द्वारा गृहद्वार खोल दिया गया ॥66॥ अथ सोऽवततार हर्म्यपृष्ठाद्युवतीस्ताः शयिता विगर्हमाणः। अवतीर्य ततश्च निर्विशङ्को गृहकक्ष्यां प्रथमां विनिर्जगाम ॥५.६७ तब सोई हुई उन युवतियों की निन्दा करते हुआ वह प्रासाद पर से उतरा। और वहाँ से उतरकर, निश्शङ्क हो घर की पहली कक्ष्या (आङ्गन) में गया ॥67॥ तुरगावचरं स बोधयित्वा जविनं छन्दकमित्थमित्युवाच। हयमानय कन्थकं त्वरावानमृतं प्राप्तुमितोऽद्य मे यियासा ॥५.६८ वेगवान् छन्दक नामक अश्व-रक्षक को जगाकर, उसने इस प्रकार कहाः- “शीघ्रता से कन्थक घोड़े को लाओ, आज यहाँ से अमरत्व प्राप्त करने के लिए मेरी जाने की इच्छा है ॥68॥ हृदि या मम तुष्टिरद्य जाता व्यवसायश्च यथा मतौ निविष्टः। विजनेऽपि च नाथवानिवास्मि ध्रुवमर्थोऽभिमुखः समेत इष्टः ॥५.६९ आज मेरे हृदय में जो सन्तोष हुआ है, और बुद्धि जिस प्रकार निश्चयात्मक हुई है और विजन में भी जिस प्रकार नाथवान् के समान हूँ, निश्चय ही इष्ट लक्ष्य सामने आ गया है ॥69॥ ह्रियमेव च सन्नतिं च हित्वा शयिता मत्प्रमुखे यथा युवत्यः। विवृते च यथा स्वयं कपाटे नियतं यातुमतो ममाद्य कालः ॥५.७० लाज व विनय को छोड़कर युवतियों जिस प्रकार मेरे सामने सोई हुई हैं, और किवाड़ जिस प्रकार स्वयं खुल गये हैं, निश्चय ही आज यहाँ से जाने का मेरा समय है” ॥70॥ प्रतिगृह्य ततः स भर्तुराज्ञां विदिथार्थोऽपि नरेन्द्रशासनस्य। मनसीव परेण चोद्यमानस्तुरगस्यानयने मतिं चकार ॥५.७१ तब राजा के आदेश का अर्थ जानते हुए भी उसने स्वामी की आज्ञा मान ली। और, मन में मानो दूसरे से प्रेरित होते हुए उसने घोड़ा लाने का विचार किया ॥71॥ अथ हेमखलीनपूर्णवक्त्रं लघुशय्यास्तरणोपगूढपृष्ठम्। बलसत्त्वजवान्वयोपपन्नं स वराश्वं तमुपानिनाय भर्त्रे ॥५.७२ तब स्वामी के लिए वह उस श्रेष्ठ घोड़े को ले आया, जिसका मुँह सोने की लगाम से भरा हुआ था, जिसकी पीठ हल्की पलान व झूले से आलिङ्गित (=ढँकी) थी, जो बल, सत्त्व, वेग व वंश से युक्त था ॥72॥ प्रततत्रिकपुच्छमूलपार्ष्णिं निभृतह्रस्वतनूनजपुच्छकर्णम्। विनतोन्नतपृष्ठकुक्षिपार्श्वं विपुलप्रोथललाटकट्युरस्कम् ॥५.७३ जिसके त्रिक (=रीढ़ का निचला भाग), पुच्छ-मूल व पार्ष्णि (ऐँड़ी, पाँव का पिछला भाग) विस्तीर्ण थे, जिसके बाल पुच्छ व कान छोटे तथा निश्चल थे, जिसकी पीठ व बगल दबे हुए और उठे हुए थे, जिसकी नाक, ललाट, कमर व छाती विशाल थी ॥73॥ उपगृह्य स तं विशालवक्षाः कमलाभेन च सान्त्वयन् करेण। मधुराक्षरया गिरा शशास ध्वजिनीमध्यमिव प्रवेष्टुकामः ॥५.७४ उस विशाल वक्षःस्थलवाले कमल के समान कान्तिमान् हाथ से उसे छूकर सान्त्वना देते हुए मधुर अक्षरों- भरी वाणी में ऐसे आदेश दिया, जैसे (विपक्षी) सेना के बीच प्रवेश करने की इच्छा (तैयारी) कर रहा होः- ॥74॥ बहुशः किल शत्रवो निरस्ताः समरे त्वामधिरुह्य पार्थिवेन। अहमप्यमृतं पदं यथावत्तुरगश्रेष्ठ लभेय तत्कुरुष्व ॥५.७५ “तुझपर चढ़कर राजा ने युद्ध में शत्रुओं को अनेक बार परास्त किया। हे तुरगश्रेष्ठ, मैं भी उस अमर पद को जिस प्रकार पाऊँ वैसा करो ॥75॥ सुलभाः खलु संयुगे सहाया विषयावाप्तसुखे धनार्जने वा। पुरुषस्य तु दुर्लभाः सहायाः पतितस्यापदि धर्मसंश्रये वा ॥५.७६ युद्ध में, विषयों से प्राप्त होनेवाले सुख में, या धन-अर्जन में साथी सुलभ होते हैं; किन्तु आपत्ति में पड़ने पर या धर्म का आश्रय लेने में पुरुष के साथी दुर्लभ हैं ॥76॥ इह चैव भवन्ति ये सहायाः कलुषे धर्मणि धर्मसंश्रये वा। अवगच्छति मे यथान्तरात्मा नियतं तेऽपि जनास्तदंशभाजः ॥५.७७ और, इस संसार में पाप-कर्म में या धर्म का आश्रय लेने में जो साथी होते हैं, मेरी अन्तरात्मा जैसा समझती है, अवश्य ही वे लोग भी उस कर्म-फल के हिस्सेदार होते हैं ॥77॥ तदिदं परिगम्य धर्मयुक्तं मम निर्याणमितो जगद्धिताय। तुरगोत्तम वेगविक्रमाभ्यां प्रयतस्वात्महिते जगद्धिते च ॥५.७८ तब यहाँ से जगत् के हित के लिए मेरे इस निष्क्रमण को धर्म-युक्त जानकर, हे तुरग-श्रेष्ठ, आत्म-हित व जगत्-हित के लिए वेग और पराक्रमपूर्वक प्रयत्न करो।” ॥78॥ इति सुहृदमिवानुशिष्य कृत्ये तुरगवरं नृवरो वनं यियासुः। सितमसितगतिद्युतिर्वपुष्मान् रविरिव शारदमभ्रममारुरोह ॥५.७९ वन जाने के इच्छुक उस नर-श्रेष्ठ ने उस उत्तम घोड़े को कर्तव्य करने के लिए ऐसे आदेश दिया, जैसे कि वह उसका मित्र हो; अग्नि के समान कान्तिमान् वह रूपवान् राजकुमार उजले घोड़े पर इस प्रकार चढ़ा, जैसे शरत्कालीन मेघ पर सूर्य ॥79॥ अथ स परिहरन्न्रिशीथचण्डं परिजनबोधकरं ध्वनिं सदश्वः। विगतहनुरवः प्रशान्तह्रेषश्चकितविमुक्तपदक्रमो जगाम ॥५.८० बुद्धचरित 31