बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविमानपृष्ठे शयनासनोचितं महार्हवस्त्रागुरुचन्दनाचितम् । कथं नु शीतोष्णजलागमेषु तच्छरीरमोजस्वि वने भविष्यति ॥८.५६ महल की छतपर के शयन और आसन से परिचित वह ओजस्वी शरीर, जो बहुमूल्य वस्त्र, अगुरु और चन्दन से पूजित (=अलङ्कृत) हुआ है, जाड़े गर्मी व वर्षा में वन में कैसे रहेगा? ॥५६ ॥ कुलेन सत्त्वेन बलेन वर्चसा श्रुतेन लक्ष्म्या वयसा च गर्वितः । प्रदातुमेवाभ्युचितो न याचितुं कथं स भिक्षां परतश्चरिष्यति ॥८.५७ कुल, सत्त्व, बल, रूप, विद्या, लक्ष्मी और वयस (=यौवन) से गौरवान्वित के लिए देना ही उचित है न कि माँगना; कैसे वह दूसरों से भिक्षा माँगेगा? ॥५७ ॥ शुचौ शयित्वा शयने हिरण्मये प्रबोध्यमानो निशि तूर्यनिस्वनैः । कथं बत स्वप्स्यति सोऽद्य मे व्रती पटैकदेशान्तरिते महीतले ॥८.५८ वह सोने की पवित्र शय्यापर सोता था और रात के अन्त में तूर्य की ध्वनि से जगाया जाता था; मेरा वह व्रती कपड़े के एक छोर से ढकी धरती पर आज कैसे सोयेगा?'' ॥५८ ॥ इमं प्रलापं करुणं निशम्य ता भुजैः परिष्वज्य परस्परं स्त्रियः । विलोचनेभ्यः सलिलानि तत्यजुर्मधूनि पुष्पेभ्य इवेरिता लताः ॥८.५९ यह करुण प्रलाप सुनकर, उन स्त्रियों ने भुजाओं से एक दूसरे का आलिङ्गन कर आँखों से आँसू बहाये, जैसे कम्पित लताएँ (अपने) फूलों से मधु (बहायें) ॥५९ ॥ ततो धरायामपतद्यशोधरा विचक्रवाकेव रथाङ्गसाह्वया । शनैश्च तत्तद्विललाप विक्लवा मुहुर्मुहुर्गद्गदरुद्धया गिरा ॥८.६० तब चक्रवाक से वियुक्त चक्रवाकी के समान यशोधरा धरती पर गिरी और विकल होकर बाष्प से बार- बार रुकती वाणी में धीरे-धीरे भाँति-भाँति से विलाप किया:- ॥६० ॥ स मामनाथां सहधर्मचारिणीमपास्य धर्मं यदि कर्तुमिच्छति । कुतोऽस्य धर्मः सहधर्मचारिणीं विना तपो यः परिभोक्तुमिच्छति ॥८.६१ “मुझ अनाथा सहधर्मचारिणी को छोड़कर यदि वह धर्म करना चाहते हैं, तो कहाँ से इन्हें धर्म होगा जो सहधर्मचारिणी के बिना ही तपस्या करना चाहते हैं? ॥६१ ॥ शृणोति नूनं स न पूर्वपार्थिवान्महासुदर्शप्रभृतीन् पितामहान् । वनानि पत्नीसहितानुपेयुषस्तथा हि धर्मं महते चिकीर्षति ॥८.६२ अवश्य ही उन्होंने प्राचीन राजाओं, महासुदर्श-आदि अपने पितामहों, के बारे में नही सुना है, जो पत्नी- सहित वन गये थे; क्योंकि वह मेरे बिना इसी प्रकार धर्म करना चाहते हैं ॥६२ ॥ मखेषु वा वेदविधानसंस्कृतौ न दम्पती पश्यति दीक्षितावुभौ । समं बुभुक्षू परतोऽपि तत्फलं ततोऽस्य जातो मयि धर्मत्सरः ॥८.६३ या यज्ञों में वेद-विधान के अनुसार संस्कृत या दीक्षित उभय दम्पती को नहीं देख रहे हैं, जो परलोक में भी यज्ञ-फल का साथ ही उपभोग करना चाहते हैं; अतः मेरे धर्म से इन्हें द्वेष हो गया है ॥६३ ॥ ध्रुवं स जानन्मम धर्मवल्लभो मनः प्रियेर्ष्याकलहं मुहुर्मिथः । सुखं बिभीर्मामपहाय रोषणां महेन्द्रलोकेऽप्सरसो जिघृक्षति ॥८.६४ निश्चय ही वह धर्म-वल्लभ मेरे मन को एकान्त में बार-बार ईर्ष्यालु और कलह-प्रिय जानकर सुख (न होने के) डर से मुझ कोपशीला को छोड़कर इन्द्र-लोक में अप्सराओं को पाना चाहते हैं ॥६४ ॥ इयं तु चिन्ता मम कीदृशं नु ता वपुर्गुणं बिभ्रति तत्र योषितः । वने यदर्थं स तपांसि तप्यते श्रियं च हित्वा मम भक्तिमेव च ॥८.६५ मेरी यह चिन्ता है कि वहाँ वह स्त्रियाँ कैसा उत्तम रूप धारण करती हैं, जिसके लिए लक्ष्मी और मेरी भक्ति को छोड़कर, वह वन में तप कर रहे हैं ॥६५ ॥ न खल्वियं स्वर्गसुखाय मे स्पृहा न तज्जनस्यात्मवतोऽपि दुर्लभम् । स तु प्रियो मामिह वा परत्र वा कथं न जह्यादिति मे मनोरथः ॥८.६६ निश्चय ही स्वर्ग-सुख के लिए मेरी यह इच्छा नहीं है, वह सुख आत्मवान् व्यक्ति (संयतात्मा के) लिए दुर्लभ नही, किन्तु वह प्रिय इस लोक या परलोक में मुझे कैसे न छोड़ें, यही मेरा मनोरथ है ॥६६ ॥ अभागिनी यद्यहमायतेक्षणं शुचिस्मितं भर्तुरुदीक्षितुं मुखम् । न मन्दभाग्योऽर्हति राहुलोऽप्ययं कदाचिदङ्के परिवर्तितुं पितुः ॥८.६७ यदि लम्बी आँखोंवाले पवित्र मुसकानवाले स्वामि-मुख को देखना मेरे भाग में नहीं है, तो क्या मन्दभाग्य यह राहुल भी पिता को गोद में कदाचित् लोटने योग्य नही? ॥६७ ॥ अहो नृशंसं सुकुमारवर्चसः सुदारुणं तस्य मनस्विनो मनः । कलप्रलापं द्विषतोऽपि हर्षणं शिशुं सुतं यस्त्यजतीदृशं बतः ॥८.६८ अहो! सुकुमार रूपवाले उस मनस्वी का मन कठोर और अतिदारुण है, जो शत्रुओं को भी हरसानेवाले तुतलाये हुए ऐसे बाल-सुत को छोड़ रहे हैं ॥६८ ॥ ममापि कामं हृदयं सुदारुणं शिलामयं वाप्ययसोपि वा कृतम् । अनाथवच्छ्रीरहिते सुखोचिते वनं गते भर्तरि यन्न दीर्यते ॥८.६९ मेरा भी हृदय अतिदारुण है, पत्थर का बना है या लोहे का भी, जो, सुख से परिचित स्वामी के श्री रहित होकर अनाथ के समान वन जानेपर, विदीर्ण नही हो रहा है" ॥६९ ॥ इतीह देवी पतिशोकमूर्च्छिता रुरोद दध्यौ विललाप चासकृत् । स्वभावधीरापि हि सा सती शुचा धृतिं न सस्मार चकार नो ह्रियम् ॥८.७० इस तरह पति के शोक से मूर्छित होकर, देवी रोई, चिन्तित हुई, और बार-बार विलाप किया। स्वभाव से धीर होनेपर भी शोक के कारण वह धैर्य भूल गई और लाज नहीं की ॥७० ॥ बुद्धचरित 45