भारतकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

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पृष्ठ 47

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**** नरपतिरथ तौ शशास तस्माद्द्रुतमित एव युवामभिप्रयातम् । **** न हि मम हृदयं प्रयाति शान्तिं वनशकुनेरिव पुत्रलालसस्य ॥८.८६ **** इसलिए तब राजा ने उन्हें आज्ञा दी— "यहाँ से आप दोनों शीघ्र चले जायें। क्योंकि, मेरा हृदय, पुत्र के **** लिए उत्सुक वन-पक्षी के हृदय के समान, शान्ति नहीं पा रहा है" ॥८६॥ **** परममिति नरेन्द्रशासनात्तौ ययतुर्मात्यपुरोहितौ वनं तत् । **** कृतमिति सवधूजनः सदारो नृपतिरपि प्रचकार शेषकार्यम् ॥८.८७ **** “अच्छा” कहकर राजा की आज्ञा से मन्त्री और पुरोहित दोनों ही उस वन को चले गये। “अच्छा ही **** किया गया”, ऐसा समझकर (पुत्र-) वधुओं और पत्नियों के साथ राजा ने भी शेष कार्य किया ॥८७॥ **** इति बुद्धचरिते महाकाव्येऽन्तःपुरविलापो नामाष्टमः सर्गः ॥८॥ **** नवम सर्ग **** कुमार-अन्वेषण **** ततस्तदा मन्त्रिपुरोहितौ तौ बाष्पप्रतोदामिहतौ नृपेण । **** विद्धौ सदश्वाविव सर्वयत्नात्सौहार्दशीघ्रं ययतुर्वनं तत् ॥९.१ **** तब उस समय मन्त्री और पुरोहित दोनों, राजा के द्वारा अश्रुरूप अङ्कुश से आहत होकर, विद्ध हुए अच्छे **** घोड़े के समान समस्त यत्न से, सौहार्द के कारण वेग से उस वन को चले ॥१॥ **** तमाश्रमं जातपरिश्रमौ तावुपैत्य काले सदशानुयात्रौ । **** राजर्द्धिमत्सृज्य विनीतचेष्टावुपैयतुर्भार्गवधिष्ण्यमेव ॥९.२ **** समय पर योग्य अनुयायियों के साथ उस आश्रम के पास वे थके हुए पहुँचे। राज-ऋद्धि को छोड़, विनीत- **** चेष्ट हो, वे भार्गव के स्थान पर गये ॥२॥ **** तौ न्यायतस्तं प्रतिपूज्य विप्रं तेनार्चितौ तावपि चानुरूपम् । **** कृतासनौ भार्गवमासनस्थं छित्त्वा कथामूचतुरात्मकृत्यम् ॥९.३ **** उन दोनों ने उस विप्र की उचित पूजा की और उसने उन दोनों की भी योग्य पूजा की। आसन ग्रहण **** कर, दोनों ने आसनपर स्थित भार्गव से कथा काटकर (= सङ्क्षिप्त कर) अपना काम कहा:- ॥३॥ **** शुद्धौजसः शुद्धविशालकीर्तेरिक्ष्वाकुवंशप्रभवस्य राज्ञः । **** इमं जनं वेत्तु भवानधीतं श्रुतग्रहे मन्त्रपरिग्रहे च ॥९.४ **** “शुद्ध ओजवाले, शुद्ध व विशाल कीर्तिवाले, इक्ष्वाकु-वंश-प्रसूत राजा के इस व्यक्ति को (= हम दोनों **** को) आप शास्त्र और मन्त्रणा में निपुण (= पुरोहित और मन्त्री) जानें ॥४॥ **** तस्येन्द्रकल्पस्य जयन्तकल्पः पुत्रो जरामृत्युभयं तितीर्षुः । **** इहाभ्युपेतः किल तस्य हेतोरावामुपेतौ भगवानवैतु ॥९.५ **** उस इन्द्र-तुल्य का जयन्त-तुल्य पुत्र जरा और मृत्यु का भय पार करने की इच्छा से यहाँ आया है, इस **** हेतु हम दोनों आये हैं, ऐसा भगवान् जानें” ॥५॥ **** तौ सोऽब्रवीदस्ति स दीर्घबाहुः प्राप्तः कुमारो न तु नावबुद्धः । **** धर्मोऽयमावर्तक इत्यवेत्य यातस्त्वराडाभिमुखो मुमुक्षुः ॥९.६ **** उसने उन दोनों से कहा— “वह दीर्घबाहु आया था, कुमार है, किन्तु बुद्धिहीन नहीं। यह धर्म आवर्तक **** (= भ्रामक) है, ऐसा जानकर वह मुमुक्षु अराड के (आश्रम की) ओर चला गया” ॥६॥ **** तस्मात्तस्ताबुपलभ्य तत्त्वं तं विप्रमामन्त्र्य तदैव सद्यः । **** खिन्नावखिन्नाविव राजभक्त्या प्रसस्रतुस्तेन यतः स यात: ॥९.७ **** तब उससे वे दोनों सच्ची बात जानकर, उस विप्र से उसी समय तुरत विदा लेकर, उस ओर चल पड़े **** जिधर वह गया था, खिन्न होकर भी राज-भक्ति के कारण वे मानो अ-खिन्न थे ॥७॥ **** यान्तौ ततस्तौ मृजया विहीनमपश्यतां तं वपुषोज्वलन्तम् । **** उपोपविष्टं पथि वृक्षमूले सूर्यं घनाभोगमिव प्रविष्टम् ॥९.८ **** तब जाते हुए उन दोनों ने मार्जन-विहीन, किन्तु रूप से जलते कुमार को देखा; रास्ते पर वृक्ष की जड़ में **** वह बैठा हुआ था, जैसे बादलों के फैलाव में सूर्य घुसा हुआ हो ॥८॥ **** यानं विहायाथोपयौ ततस्तं पुरोहितो मन्त्रधरेण सार्धम् । **** यथा वनस्थं सहवामदेवो रामं दिदृक्षुर्मुनि रौर्वशेयः ॥९.९ **** तब रथ छोड़कर मन्त्री के साथ पुरोहित उसके समीप गया, जैसे वन में स्थित राम के समीप वामदेव के **** साथ दर्शनाभिलाषी और्वशेय मुनि (= वशिष्ठ) गया था ॥९॥ **** तावर्चयामासतुरर्हतस्तं दिवीव शुक्राङ्गिरसौ महेन्द्रम् । **** प्रत्यर्चयामास स चार्जतस्तौ दिवीव शुक्राङ्गिरसौ महेन्द्रः ॥९.१० **** उन दोनों ने उसकी उचित पूजा की, जैसे स्वर्ग में शुक्र और आङ्गिरस (= बृहस्पति) ने इन्द्र की (पूजा की **** थी) और उसने उन दोनों की उचित पूजा की, जैसे स्वर्ग में इन्द्र ने शुक्र और आङ्गिरस की (पूजा की **** थी) ॥१०॥ **** कृताभ्यनुज्ञावभितस्तस्तौ निषेदतुः शाक्यकुलध्वजस्य । **** विरेजतुस्तस्य च सन्निकर्षे पुनर्वसू योगगताविवेन्दोः ॥९.११ **** आज्ञा पाकर, शाक्य-कुल की पताका (सिद्धार्थ) की दोनों ओर वे दोनों बैठ गये और उसके समीप ऐसे **** विराजे जैसे चन्द्रमा के समीप योग को प्राप्त पुनर्वसु-युगल ॥११॥ **** तं वृक्षमूलस्थमभिज्वलन्तं पुरोहितो राजसुतं बभाषे । **** यथोपविष्टं दिवि पारिजाते बृहस्पतिः शक्रसुतं जयन्तम् ॥९.१२ **** वृक्ष-मूल में स्थित उस जलते हुए राज-पुत्र से पुरोहित ने कहा, जैसे स्वर्ग में परिजात वृक्ष के नीचे बैठे **** हुए शक्र-पुत्र जयन्त से बृहस्पति (कह रहा हो):- ॥१२॥ **** बुद्धचरित 47