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बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

55 तब अपने देश में मुनि के लिए एक स्तूप बनाने की इच्छा से द्रोण ने अपने हिस्से में घड़ा लिया और पिसल नामक लोगों ने भक्तिपूर्वक बची हुई राख ली।$^{106}$ 56 शुरु में श्वेत पर्वतों के समान आठ स्तूप थे, जिनके भीतर धातुएँ थीं। ब्राह्मण का घड़ावाला स्तूप नवाँ था और राखवाला दसवाँ। 57 प्रजा-सहित राजाओं ने और बच्चों-सहित ब्राह्मणों ने पृथ्वी पर मुनि के इन विविध स्तूपों की पूजा की, जिनपर पताकाएँ फहरा रही थीं और जो कैलास की बर्फीली चोटियों के समान दिखाई पड़ते थे। 58 अनेक भूपों ने स्तोत्र-गान, उत्कृष्ट सुगन्धियों, सुन्दर मालाओं और गीत-ध्वनि से स्तूपों की, जिनमें बुद्ध (= जिन) की धातुएँ थीं, उत्तम उपासना की। 59 तब कालक्रम से 500 अर्हत् 5 पर्वतों से चिह्नित नगर में एकत्र हुए और फिर से धर्म को अच्छी तरह संस्थापित (स्थिर) करने के लिए उन्होंने पर्वत के ऊपर मुनि के उपदेशों का सङ्ग्रह किया। 60 आनन्द ने ही महामुनि से सब उपदेश सुने थे, ऐसा निश्चयकर शिष्यों ने सङ्घ की सम्मति से उस वैदेह मुनि से शास्त्र (= प्रवचन) दुहराने के लिए कहा। 61 तब वह उन लोगों के बीच बैठ गया और "मैंने ऐसा सुना है" इस तरह कहते हुए तथा स्थान, प्रसङ्ग, समय और श्रोता की व्याख्या करते हुए, उसने उपदेशों को वैसे ही दुहराया जैसे कि वक्ता-श्रेष्ठ (बुद्ध) ने कहा था। 62 इस प्रकार अर्हतों के साथ उसने मुनि का धर्म-शास्त्र निश्चित किया और प्रयत्नपूर्वक इसका पूरा ज्ञान प्राप्त करनेपर ही मनुष्य दुःख के परे गये हैं, जा रहे हैं, और जायँगे। 63 काल-क्रम से धर्म-रत अशोक का जन्म हुआ; उसने अहङ्कारी शत्रुओं को शोकाकुल किया और दुःखी लोगों का शोक दूर किया, वह फूलों और फलों से लदे अशोक-वृक्ष के समान प्रियदर्शन था। 64 मौर्य-वंश के उज्ज्वल गौरव अशोक ने प्रजा की भलाई के लिए सम्पूर्ण पृथ्वी पर स्तूप बनाने का कार्य आरम्भ किया और इसलिए जो चण्डाशोक कहलाता था वह धर्म-राज अशोक बन गया। 65 उस मौर्य ने मुनि की धातुओं को सात स्तूपों से जिनमें वे रक्खी गई थीं, लेकर एक ही दिन में क्रम से 80,000 भव्य स्तूपों के बीच बाँट दिया, जो शरदृतु के उज्ज्वल मेघों के समान चमक उठे। 66 रामपुर में स्थित आठवाँ मूल स्तूप उस समय विश्वस्त नागों से रक्षित था और इसलिए राजा ने उस (स्तूप) से धातुओं को प्राप्त नही किया; किन्तु इससे उन (धातुओं) में उसकी श्रद्धा बहुत बढ़ गई। 67 चञ्चल राज्य-लक्ष्मी की रक्षा करते हुए भी और चित्त के लिए शत्रुस्वरूप उपभोगों के बीच रहते हुए भी, राजा ने काषाय-वस्त्र पहने बिना ही अपने चित्त को शुद्ध किया और प्रथम फल प्राप्त किया। 68 इस प्रकार जिस किसी ने जहाँ कहीं मुनि का सम्मान (पूजा) किया है, करता है, या करेगा उसे सज्जन-सुलभ परम फल प्राप्त हुआ है होता है या होगा। 69 हे बुद्धिमान् मनुष्यो, विदित हो कि बुद्ध के गुण ऐसे हैं कि समान मानसिक शुद्धि होनेपर, ऐहिक जीवन में मुनि का सम्मान करने से या उनके परिनिर्वाण के बाद उनकी धातुओं को प्रणाम करने से एक ही फल प्राप्त होता है।$^{107}$ 70 इसलिए उदारचेता करुणामय परम पूज्य मुनि की पूजा करनी चाहिए, जो लाभप्रद, सदा- अव्यर्थ, अविकारी (अपरिवर्तनशील) परम और उत्कृष्ट धर्म के ज्ञाता थे। 71 क्या इस जगत् में यह उचित नही कि कृतज्ञ बुद्धिमान् धर्मात्मा उन्हें धन्यवाद दें जिन्होंने, मनुष्यों के आशय की सम्यक् जानकारी रखते हुए, करुणावश, परोपकार के लिए महान् परिश्रम किया? 72 पृथिवी पर जरा और मरण के समान तथा स्वर्ग में वहाँ से गिरने के समान कोई विपत्ति नही, यह देखते हुए कौन सज्जन उतना पूज्य है जितना कि वह जिन्होंने विश्व की इन दो विपत्तियों को पहचाना? 73 जबतक जन्म है तबतक दुःख है, और पुनर्जन्म से मुक्ति के समान कोई सुख नही; कौन सज्जन उतना पूज्य है जितना कि वह जिन्होंने इस मुक्ति को प्राप्तकर संसार को दिया? 74 मुनि-श्रेष्ठ के प्रति सम्मान-भाव से, मुनि के शास्त्रानुसार, मनुष्यों के हित व सुख के लिए, न कि विद्वत्ता या काव्य-कौशल दिखाने के लिए, यह काव्य रचा गया। ॥ बुद्धचरित महाकाव्य का "धातु-विभाजन" नामक 28वाँ सर्ग समाप्त ॥ ॥ समाप्तसम्पूर्णबुद्धचरित ॥ $^{106}$ - पिसल के स्थान में "पिप्पल" पढ़ने का सुझाव जॉन्स्टन ने किया है, इसलिए कि मौर्य पिप्पलवनिक थे। चीनी अनुवाद में है "कुशीनगर के लोग"। 120 अश्वघोष $^{107}$ - "हे बुद्धिमान् मनुष्यो, विदित हो" या "बुद्धिमान् मनुष्य जानते हैं"।

परिशिष्ट 1 अतिरिक्त टिप्पणी एवं पाठान्तर

1.10 कक्षीवान्। “आसन्दीवद्दधी” (अष्टाध्यायी 8.2.12) इति निपात्यते, कक्षीवानृषिः। 1.18 अनुवाद और 13.56 क के आधार पर कोष्ठगत 'अदृश्यरूपाश्च' रखा है। 1.24 घ-अनुवाद के आधार पर रिक्त स्थान की पूर्ति की गई है। 1.61 संविष्टः = सुप्तः (रघुवंश 1.95)। देवी = पार्वती। अग्निपुत्र = कार्तिकेय। 2.1 पा० “जन्मजरान्तगस्य” 2.2 कृताकृत = घटिताघटित = गढ़ा हुआ और नहीं गढ़ा हुआ (चाँदी-सोना) - अमरकोष। 2.3 पद्म = दक्षिण दिशा में स्थित दिग्गज। मण्डल = राज्य, देश, हस्तिशाला, हाथियों का घेरा (दे० 5.23)। 2.7 ख-पा० “०मण्डितागः”। 2.25 घ- पा० 'वनं न यायादिति'। 2.33 घ- 'संविबभाज...' = या 'साधुओं की सेवा की'। 2.44 ख-अभिध्या = लोभ। अविवक्षीत्-वह् + सन् + लुङ्। 2.51 'स्वायंभुव सामवेदीय सूक्त का श्रद्धापूर्वक जप किया' - बंगला अनुवाद। 2.54 निपात-नि + पा + क्त। दे०- सो० 18.31 3.1 गीतैर्निबद्धानाि काननानि = संगीत से गूंजते हुए नगर-उद्यानों के बारे में; या उन उद्यानों के बारे में जिनके (सम्बन्ध में) गीत गाये जाते थे। 3.9 क-पा० '०पुष्पलाजं'। 3.26 ग-पा० 'प्रयातुं' के स्थान में 'प्रयान्तं'। 3.31 ख-पा० 'बालेन'-बालक होकर धूल में खेला। 3.53 ग-'स्याद् व्यत्यासो विपर्यासो व्यत्ययश्च विपर्यये'-अमरकोष। 3.57 घ-पा० 'प्रियः प्रियैस्'। 3.60 घ-पा० 'निर्हादवता'। 4.16 सम्भवतः 'काशिसुन्दरी' नाम नही, किन्तु विशेषण; इसका अर्थ होगा 'काशी की रूपवती (वेश्या)'। 4.38 घ-धीरलीलैया चेष्टितं = गम्भीरता का, स्थिर गति-विधि का। 4.56 क-उ + ईमाः = विमाः; पा० 'किं न्विमा'? ग-पा० 'संमता'। 5.8 ख-पा० 'निवर्त्य'।


5.19 ग-परिग्रह = घर स्वजन साथी सम्पति आदि बन्धन। 5.22 ग-पा० 'परिवर्त्य जनं'। 5.32 ख-लक्ष्म = प्रधान, योग्य। 5.40 निदर्शित = उदाहरण और दृष्टान्त देकर समझाये जानेपर। 5.52 शालभञ्जिका = शालवृक्ष (के काष्ठ) से बनाई गई मूर्ति। 5.53 पा० 'मणिकुण्डलदष्टगण्डलेखम्'। 5.55 योक्त्र = मुख का कोई आभूषण। 5.59 'स्पृष्टं स्फुटं प्रव्यक्तमुल्बणम्'-अमरकोष। 5.66 तदन्तरं = स्वभाव और बाह्य आभूषण का अन्तर; या सुयोग। 5.75 पा०- 'यथा ततुरुग्रश्रेष्ठ'। 5.84 क-पा० 'विकचपङ्कजो'। विकच = विकसित। घ-पा० 'पुनरहं'। 5.86 ग-पा० 'अकुरुत'। 6.34 ख-पा० 'यशोधर्मभृतां वरं'। 6.37 'उचितदर्शित्वात्' अन्तःपुर या छन्दक के लिए भी हो सकता है। शुभ वस्तुओं को ही देखनेवाले या शुभ संवाद ही सुननेवाले अन्तःपुर में। अथवा, न्यायोचित को देखनेवाला या उचित कर्म करनेवाला में (छन्दक)। 6.57-58 एनं और तं मुकुट के लिए प्रयुक्त हुआ है या असि के लिए? 8.48 से ज्ञात होता है मुकुट के लिए। 7.42 ख-पा० 'सङ्कीर्णधर्मे पतितो०'; 'सङ्कीर्णधर्मा पतितो०'। 7.43 घ-पा० 'बृहस्पतेरप्युदयावहः'। 7.50 बहुमानमीयुः = (उन तपस्वियों ने मन में) उनका बड़ा सम्मान किया। 8.13 रघुवंश 10.7 की व्याख्या में मल्लिनाथ द्वारा उद्धृत। 8.31 ख-'विषाद-जन्य बाष्प से अवरुद्ध वाणी में'। दे० 2.62 ग तथा 8.60 घ। 8.39 घ- 'श्रियं' = या 'राज्यलक्ष्मी को' 8.57 ग-या 'दान देने का अभ्यासी था, माँगने का नहीं'। 8.66 ग घ-'भूयो यथा मे जननान्तरेऽपि स्वमेव भर्ता न च विप्रयोगः।'-रघुवंश 14.66। 9.21 घ-पा० 'वित्ताधिपत्यं'। विद् ज्ञाने क्त वित्तम्। 10.2 ख-धृतं च पूतं च = पोषित एवं पवित्रीकृत-बंगला अनुवाद (रथीन्द्र) 10.26 घ-'सहीया' यह शब्द केवल बौद्ध-साहित्य में ही पाया जाता है। 10.30 पा० 'स्ववंशप्रतिरूपरूपं' = अपने वंश के अनुरूप रूप को।

बुद्धचरित 121

11.41 ग-भावाः = पदार्थाः-सिद्धान्त कौमुदी, कृदन्त प्रकरण; और दे० बु० च० 12.27 11.45 ग-आसंगकाष्ठ = भारवाही दण्डकाष्ठ-बंगला अनुवाद (रथीन्द्र) 11.49 ग घ 'मनसि च परितुष्टे कोऽर्थवान् को दरिद्रः'-वैराग्य शतक । 11.70 'अव' धातु के अनेक अर्थों को ध्यान में रखते हुए तथा 'आर्यैः' के स्थान में 'आर्यान्' पढ़ते हुए, इस श्लोक का अर्थ यह होगा- इन्द्र के समान रक्षा करें, आकाश के सूर्य के समान सदा प्रज्वलित हों, सद्गुणों से शोभित हों, इस संसार में श्रेय को समझें, पृथ्वी का पालन करें, (दीर्घ) आयु प्राप्त करें, सज्जनों व सत्पुत्रों को तृप्त करें, ऐश्वर्य की वृद्धि करें; हे राजन्, अपने धर्म से लिपटे रहें (या स्वधर्म का आचरण करें) । 13.60 यही श्लोक परिमार्जित रूप से भास-प्रणीत प्रतिज्ञायौगन्धरायण नामक नाटक में आया है। 14.14 उत्तरार्ध का यह अर्थ भी होगा- कोई-कोई लौहचंचु धृष्ट कौओं द्वारा, जो लोहे के बने-से लगते हैं, खाये जाते हैं। समाप्त 3.7.2021 122 अश्वघोष