भारतकोश
चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

Chanakya Niti Darpan Hindi

आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा

स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished132 पृष्ठ

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चाणक्यनीतिदर्पणः ७३

वने हस्ती मदोन्मत्तः शशकेन निपातितः ॥१६॥

दोहा—बुद्धि जासु है सो बली, निबुद्धिहि बल नाहिं । अति बल हाथिहिं स्यार लघु, चतुर हतेसि बन माहिं ॥१६॥

जिसके पास बुद्धि है उसी के पास बल है, जिसके बुद्धि ही नहीं उसके बल कहाँ से होगा । एक जंगल में एक बुद्धिमान् खरगोश ने एक मतवाले हाथी को मार डाला था ॥१६॥

का चिन्ता मम जीवने यदि हरिविश्वम्भरो गीयते । नो चेदर्भकजीवनाय जननीस्तन्यं कथं निःसरेत् ॥ इत्यालोच्य मुहुर्मुहुर्यदुपते लक्ष्मीपते केवलम् । त्वत्पादाम्बुजसेवनेन सततं कालो मया नीयते ॥१७॥

छन्द—है नाम हरिको पालक मन जीवन शंका क्यों करनी । नहिं तो बालकजीवन को थन से पय निसरत क्यों जननी ॥ यही जानकर बार है यदुपति लक्ष्मीपति तेरे । चरण कमल के सेवन से दिन बीते जायँ सदा मेरे ॥१७॥

यदि भगवान् विश्वंभर कहलाते हैं तो हमें अपने जीवन सम्बन्धी झंझटों (अन्न-वस्त्र आदि) की क्या चिन्ता ? यदि वे विश्वम्भर न होते तो जन्म के पहले ही बच्चे को पीने के लिए माता के स्तन में दूध कैसे उतर आता । बार-बार इसी बात को सोचकर हे यदुपते ! हे लक्ष्मीपते ! मैं केवल आप के चरण-कमलों की सेवा करके अपना समय बिताता हूं ॥१७॥

गीर्वाणवाणीषु विशिष्टबुद्धि— स्तथापि भाषान्तरलोलुपोऽहम् ।