चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
१२८ चाणक्यनीतिदर्पणः
राजा, वेश्या, यम, अग्नि, चोर, बालक, भिखारी और ग्रामकण्टक यानी गाँववालों को दुःख देनेवाला, ये आठ प्राणी दूसरे के दुःख नहीं समझते ॥१९॥
अधः पश्यसि किं बाले ! पतितं तव किं भुवि ? रे रे मूर्ख ! न जानासि गतं तारुण्यमौक्तिकम् ॥२०॥
कोई स्त्री किसी पुरुषको देखकर लज्जा भावसे सिर नीचा करके एक तरफ खड़ी हो गई। इस पर भी उस बेहया पुरुषने उसे छेड़ते हुए पूछा- बाले ! तुम्हारी कोई चीज गिर गयी है? क्या ढूँढ़ रही हो ! इसपर उसने झुँझलाके जवाब दिया- अरे मूर्ख ! क्या तू नहीं जानता ? यहाँ मेरी जवानीकी मोती खो गयी है ॥२०॥
व्यालाश्रयोऽपि विफलाऽपि सकण्टकाऽपि वक्राऽपि पंकसहिताऽपि दुरासदाऽपि । गन्धेन बन्धुरसि केतकि सर्वजन्तो— रेको गुणः खलु हन्ति समस्तदोषान् ॥२१॥
कवि अन्योक्ति के रूप में केतकी (केवड़ा) से कहता है— केतकी ! यद्यपि तू साँपों का घर है, तेरे में काँटे भी बहुत होते हैं, तू टेढ़ी-मेढ़ी भी है, तेरे में कीचड़ भी होता है और तू मिलती भी मुश्किलसे है फिर भी तेरे में सुगन्ध है, उसी सुगंध की बदौलत तू सबको प्रिय है। कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य में चाहे कितने ही अवगुण हों पर यदि एक भी उज्जवल गुण उसके पास रहता ह तो उसके सब दोष छूमन्तर हो जाते हैं ॥२०॥
इति श्री पं० रामतेजपाण्डेयकृतभाषानुवाद सहितश्चाक्य-नीतिदर्पणः समाप्तः ।
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CC-0. Swami Atmanand Giri (Prabhuji) . Veda Nidhi Varanasi. Digitized by eGangotri
🌸 ज्योतिष विद्या का चमत्कार 🌸
एकबार अवश्य मँगावें ।
आप आश्चर्य न करें तो अच्छाही है । इस दुनियाँ में सभी कलायें एक तरफ और "ज्योतिष विद्या का चमत्कार एक तरफ है" बड़े से बड़े राजा, महाराजा, नेता, उद्योगपति हो वा जन साधारण सभी को भगवान भरोसे रहनाही पड़ता है और इस विद्या के ऊपर विश्वास करने सेही आपके भूत भविष्य व वर्तमान की सहायता से मालूम पड़ती है, जिसे आप स्वयं पढ़कर अनुभव करिये ।
| ग्रन्थ का नाम | मूल्य | ग्रन्थ का नाम | मूल्य |
|---|---|---|---|
| बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् | ६४) | बृहज्जातक भा.टी. | ३०) |
| भृगुसंहिताफलितसर्वाङ्ग | ३६) | रमलदिवाकर ,, | १६) |
| मानसागरी भा. टी. | २८) | सामुद्रिक रहस्य,, | १०) |
| ताजिकनीलकंठी ,, | २०) | लग्नचन्द्रिका ,, | ८) |
| जातकभरण ,, | २०) | गृहरत्नभूषण ,, | ५) |
| बृहद्ज्योतिषसार ,, | १५) | वास्तुप्रबन्ध ,, | ८) |
| कर्मविपाक ,, | १५) | ग्रहबल दर्पण ,, | ६) |
| भावकुतूहल ,, | १५) | जन्मप्रबोध ,, | ३) |
| मुहूर्त्तचिन्तामणि ,, | १३) | शीघ्रबोध ,, | ५) |
| लघुपाराशरी हिन्दी टीका | ४) | जातकालंकार भा.टी. | २) ५० |
| विवाहदाम्पत्य निर्णय | १४) |
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ठाकुर प्रसाद एण्ड सन्स, बुकसेलर,
राजादरवाजा, वाराणसी ।
मुद्रक—स्वतन्त्रभारत प्रेस, वाराणसी ।