चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
पृष्ठ 313, कुल 520 में से
संदर्भ में पढ़ें१७८ पाठान्तर—बम्बई और मनेर प्रति— शीर्षक—( ब ) करदबंशिरिये खुद नमूनन गोरक राव अन्वेशमन्द शुदन बुरई पाँवा रा (गोरकका नौंरके लिए व्यथित होना और पश्चात्ताप करना)। (म) बाद कर्दने गोरक साखते बद बत्तर रफ्तन (गोरकका कुसाइतमें यात्रा आरम्भ करनेकी बात याद करना)। १—(बं, म) र । २—(बं) के र । (म) के। ३—(म) कशप । ४—(बं, म) भाँवर । ५—(बं, म) र । ६—(ब) कै र, (म)—के। ७—(ब) मुदि । ८—(ब, म) के । ९—(बं) कै गै कुसगुन; (म) के कुसगुन हम । १०—(ब, म) बाँटन । ११— (म) ही । १२—(ब) नहर: (म) पाहिर (?) १३—(ब) पाँव न वोधी (म) बाँद अकोसी । १४—(बं, म) कै र । १५—(ब) के नेहूँ कनु बर सुकुराई (म) के नेहूँ कछु बर सुकनाथा । १६— (ब, म) तुम्ब । १७—(बं, म) रुहाहु । १८—(म) रुपनहिं । टिप्पणी—(१) के—घातो। कुदिन—अशुभ दिन। पाँचव—प्रस्थान। कश्यप— दुःखसे व्यथित हृदयसे निकला हुआ शाप । (२) शराप—शाप। माई—माँ माता । (३) घरी—घड़ी। धरत—रखते हुए। गा—गया 'का' पाठ भी सम्भव है। उस अवस्था में अर्थ होगा—क्या। कुसगुन—अपशकुन । कीत—किया। पयानाँ—प्रस्थान रवानगी। (४) इत—इतना। चाँट—चींटी। रुहपा—दैव ईश्वर। (५) अकोसी—निर्दोष। विवंसी—सन्तानहीन स्त्री। कोसी— शाप दिया। ३५१ (रीडिंग्स १६६; बम्बई ३०; मनेर १६०ख) ऐकन (वही) नाग मेस होइ' धनि घरी' । छोरहि राम अपस्सा परी ॥१ रामहिं इनिबन्त भयउ संघाता। मुहिं न फोइ बुरु दई' विधाता ॥२ मरिउँउँ कोइ जो करइ उपकारा' । सिरजनहार देयहि निस्तारा ॥३ इनिरन्त मीठा फल धसि मारी । लंका खोंट खोंट कें जारी ॥४ हां पुनि पाँद हरी जो पाऊँ । संका छाड़ि पतंगअ धाऊँ ॥५