चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८८ आदमी नहीं मिला जो तुम मेरे पीठपर अंगार डाल रही हो ? संसारमें न जाने कितने कुँवारे हैं। डिक्क पड़ाकर ब्याह क्यों नहीं कर लेती ? तुम मेरे पतिको भुलाकर मेरी सौत क्यों बन रही हो ? अभी कल तो वह मेरा गौना कराकर लाये और आज तुम सौत बन गयी। पन्वाका यह सुनना था कि वह मंजरीको गालियाँ देने लगी। बोली- अपने पतिको रस्सीमें बाँध क्यों नहीं रखती ! इतना सुनते ही मञ्जरीने दौड़कर उसका केश पकड़कर लीजा और लगी उसे पीटने । दोनोंको मारपीट करते देख भीड़ जमा हो गयी । लेकिन डरके मारे उन्हें छुड़ानेकी हिम्मत किसीको न हुई । जिस कोयरीका खेत था, वह अपने खेतको लथा नाथ होते देख भागा हुआ लोरिकके पास पहुँचा। सुनते ही लोरिक दौड़ा हुआ आया । मञ्जरीने लोरिकको देखते ही पन्वाको छोड़ दिया और घर चली आयी। लोरिक उसके पीछे-पीछे घर पहुँचा और मंजरीसे बोला-दूसरेकी बेटीका इस प्रकार उपहास क्यों करती हो ? बात क्या हुई जो इस प्रकार तुमने पन्वाका अप- मान किया ? यह सुनकर मञ्जरी बोली-तुम अपने मनकी बात सच-सच कहो ! पन्वा मुझसे किस बातमें अधिक है ? धनमें बुद्धिमें, रूपमें ? किस कारण तुम उसपर मोहित हो गये हो ? यदि तुमको उसपर ही लुभाना था तो मुझसे विवाह ही क्यों किया ! उसीसे ब्याह कर लेते । लोरिकने हँसकर कहा-सब लोग खेती करते हैं यह तो तुम जानती हो। अपने खेतमें अच्छा अनाज होते हुए भी लोग दूसरेके खेतसे कचरी उखाड़कर खाते हैं। बस, वही तुम समझ लो । उसके साथ तो बस चित्तका आमोद-प्रमोद है। तुम तो जीवन भरके लिए हो ! इतना कहकर लोरिक चला गया । धीरे धीरे सोमवारका दिन आया । शामको मञ्जरी सब तरहसे निश्चिन्त फिर चुकी तब उसने अपनी साससे कहा-आज जरा होशियार रहना। घरमें आज चोरी होनेवाली है। पन्वाको लेकर स्वामी हरदी भागने- का इरादा कर रहे हैं। यह सुनकर मूहकुण्डनने कही-मेरे हाथमें रुबड़ा (मोटा डंडा) दे दो और दरवाजेपर खाट बिछा दो । दरवाजेको कचकर नहीं छोड़ूँगी। जैसे ही पन्वाकी आवाज सुनायी देगी, वैसे ही यह रुबड़ा से मारूँगी। उसका सिर फूट जायेगा । मञ्जरी अपने कमरेमें आयी और लोरिकको मोचना कराकर बाहरका दरवाजा बन्द कर दिया । फिर लोरिकसे कहा-प्रतिदिन आप बाहर सोते हैं ! आज यहीं रह जावें । इतना कहकर वह सोनेका प्रबन्ध करने लगी । लोरिक थक गया और उसने मँजरीके साथ बातें करके जागते ही रात बिता दी । इधर पन्वा अपने पिताके भण्डारसे सोनेकी पिटारी उठाकर बाहर निकली। रास्तेम जहाँ-तहाँ सिन्दूरका टीका लगाती गयी और बढ़लीके पेड़के नीचे पहुँचकर लोरिककी प्रतीक्षा करने लगी। चार प्यासी