छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 113, कुल 978 में से
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| खण्ड ८ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १०९ |
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| योरिति लिङ्गाद्राजासौ युवयो-<br>र्ब्राह्मणयोर्वदतोर्वाचं श्रोष्यामि।<br><br>अर्थरहितमित्यपरे वाचमिति विशेषात् ॥ २ ॥ | को मैं श्रवण करूँगा। 'आप दोनों ब्राह्मणोंके' इस कथन रूप लिङ्गसे ज्ञात होता है कि वह क्षत्रिय है 'वाचम्' ऐसा विशेषण होनेके कारण दूसरे व्याख्याकार 'अर्थहीन शब्दमात्र सुनूँगा' ऐसा अर्थ करते हैं ॥ २ ॥ |
स ह शिलकः शालावत्यश्चैकितायनं दाल्भ्यमुवाच हन्त त्वा पृच्छामीति पृच्छेति होवाच ॥ ३ ॥
तब उस शालावान्के पुत्र शिलकने चिकितायनकुमार दाल्भ्यसे कहा—'यदि तुम्हारी अनुमति हो तो मैं तुमसे पूछूँ?' उसने कहा—'पूछो' ॥ ३ ॥
| उक्तयोः स ह शिलकः शालावत्यश्चैकितायनं दाल्भ्यमुवाच —हन्त यद्यनुमंस्यसे त्वा त्वां पृच्छानीत्युक्त इतरः पृच्छेति होवाच ॥ ३ ॥ | उपर्युक्त दोनोंमेंसे शालावान्के पुत्र शिलकने चैकितायन दाल्भ्यसे कहा—'यदि तुम अनुमति दो तो मैं तुमसे पूछूँ।' तब इस प्रकार कहे जानेपर दूसरेने 'पूछो' ऐसा कहा ॥ ३ ॥ |
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| लब्धानुमतिराह— | उसकी अनुमति पाकर [ शिलकने ] कहा— |