भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 129, कुल 978 में से

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पृष्ठ 129

खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५


‘क्या ये (उड़द) भी उच्छिष्ट नहीं हैं?’ उसने कहा—‘इन्हें बिना खाये तो मैं जीवित नहीं रह सकता था, जलपान तो मुझे यथेच्छ मात्रामें मिलता है’॥ ४ ॥

| किं न स्विदेते कुल्माषा अप्युच्छिष्टा इत्युक्त आहोपस्तिर्न वा अजीविष्यं न जीविष्यामीमान्कुल्माषानखादन्नभक्षयन्निति होवाच। काम इच्छातः मे ममोदकपानं लभ्यत इत्यर्थः। <br><br> अतश्चैतामवस्थां प्राप्तस्य विद्याधर्मयशोवतः स्वात्मपरोपकारसमर्थस्यैतदपि कर्म कुर्वतो नागःस्पर्श इत्यभिप्रायः। तस्यापि <br><br> जीवितं प्रत्युपायान्तरेऽजुगुप्सिते सति जुगुप्सितमेतत्कर्म दोषाय। ज्ञानावलेपेन कुर्वतो नरकपातः स्यादेवेत्यभिप्रायः, प्रद्राणकशब्दश्रवणात् ॥ ४ ॥ | ‘क्या ये उड़द भी उच्छिष्ट नहीं हैं?’ ऐसा कहे जानेपर उषस्तिने कहा—‘इन उड़दोंको बिना खाये-बिना भक्षण किये तो मैं जीवित नहीं रह सकता था। जलपान तो मुझे इच्छानुसार मिल जाता है।’ <br><br> अतः इसका यह अभिप्राय है कि इस अवस्थाको प्राप्त हुए, विद्या, धर्म और यशसे सम्पन्न तथा अपने और दूसरोंके उपकारमें समर्थ पुरुषको ऐसा कर्म करते हुए भी पापका स्पर्श नहीं हो सकता। उसके भी जीवनका यदि कोई अन्य अनिन्द्य उपाय हो तो यह निन्दनीय कर्म दोषके ही लिये होगा। ज्ञानाभिमानवश ऐसा कर्म करनेवाले पुरुषका भी नरकमें पतन होगा ही—यह इसका अभिप्राय है; क्योंकि श्रुतिमें ‘प्रद्राणक’ शब्दका प्रयोग है*॥४॥ |


* चाक्रायणने ‘प्रद्राणक’ अर्थात् अत्यन्त आपद्ग्रस्त होनेपर ही उच्छिष्ट भोजन किया था—इससे यह सिद्ध होता है कि विधिका व्यतिक्रम जीवनरक्षाका कोई वैध साधन न रहनेपर ही किया जा सकता है अन्यथा कदापि नहीं।