छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 131, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ १२७
| वा परित्यजन्नुवाच पत्न्याः शृण्वन्त्याः, यद्यदि बतेतिखिद्यमानोऽन्नस्य स्तोकं लभेमहि तद्भुङ्क्तवान्नं समर्थो गत्वा लभेमहि धनमात्रां धनस्याल्पम्। ततोऽस्माकं जीवनं भविष्यतीति।<br><br>धनलाभे च कारणमाह—<br>राजासौ नातिदूरे स्थाने यक्ष्यते। यजमानत्वात्तस्यात्मनेपदम्। स च राजा मा मां पात्रमुपलभ्य सर्वैरात्विज्यैर्ऋत्विकर्मभिर्ऋत्विकर्मप्रयोजनायेत्यर्थो वृणीतेति ॥ ६ ॥ | अपनी पत्नीके सुनते हुए कहा—'यदि [ भूखसे ] खिन्न होते हुए हमें थोड़ा-सा अन्न मिल जाता—यहाँ 'बत' अव्ययका तात्पर्य है 'खिन्न होते हुए'—तो उस अन्नको खाकर सामर्थ्यवान् हो [ कुछ दूर ] जाकर हम धनकी मात्रा अर्थात् थोड़ा-सा धन प्राप्त कर लेते और उससे हमारा जीवन-निर्वाह हो जाता ।<br><br>धनलाभमें कारण बतलाता है—यहाँसे थोड़ी ही दूरपर वह राजा यज्ञ करेगा । यजमान होनेके कारण उसके लिये 'यक्ष्यते' ऐसा आत्मनेपदका प्रयोग किया गया है*। वह राजा मुझे सुपात्र समझकर समस्त आर्त्विज्यों —ऋत्विक्कर्मोंके लिये अर्थात् ऋत्विक्कर्मोंको करानेके प्रयोजनसे वरण कर लेगा ॥ ६ ॥ |
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तं जायोवाच हन्त पत इम एव कुल्माषा इति तान्खादित्वामुं यज्ञं विततमेयाय ॥ ७ ॥
उससे उसकी पत्नीने कहा—'स्वामिन् ! [ आपके दिये हुए ] वे उड़द ही ये मौजूद हैं; [इन्हें लीजिये ] ।' उषस्ति उन्हें खाकर ऋत्विजोंद्वारा विस्तारपूर्वक किये जानेवाले उस यज्ञमें गया ॥ ७ ॥
* क्योंकि यजनरूप क्रियाका फल उस राजाको ही प्राप्त होनेवाला था ।