छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 133, कुल 978 में से
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खण्ड १०] शाङ्करभाष्यार्थ १२९
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| हे प्रस्तोतरित्यामन्त्र्याभिमुखीकरणाय । या देवता प्रस्तावं प्रस्तावभक्तिमनुगतान्वायत्ता तां चेद्देवतां प्रस्तावभक्तेरविद्वान्सन् प्रस्तोष्यसि विदुषो मम समीपे । | ‘हे प्रस्तोतः !’—इस प्रकार अपनी ओर लक्ष्य करानेके लिये सम्बोधन करते हुए [वह बोला—] ‘जो देवता प्रस्तावमें—प्रस्तावभक्तिमें अन्वायत्त यानी अनुगत है, यदि उस प्रस्तावभक्तिके देवताको बिना जाने ही तू उसका, उसे जाननेवाले मेरे समीप, प्रस्तवन करेगा तो तेरा मस्तक गिर जायगा ।’ |
| तत्परोक्षेऽपि चेद्विपतेत्तस्य मूर्धा कर्ममात्रविदामनधिकार एव कर्मणि स्यात् । तच्चानिष्टम्, अविदुषामपि कर्मदर्शनात्, दक्षिणमार्गश्रुतेश्च । अनधिकारे चाविदुषामुत्तर एवैको मार्गः श्रूयेत । न च स्मार्तकर्मनिमित्त एव दक्षिणः पन्थाः, “यज्ञेन दानेन” इत्यादिश्रुतेः । 'तथोक्तस्य मया' इति च विशेषणाद्विद्वत्समक्षमेव कर्मण्यनधिकारो न सर्वत्राग्नि- | यदि यह माना जाय कि देवतां-ज्ञानियोंके परोक्षमें भी मस्तक गिर जायगा तो केवल कर्मका ही ज्ञान रखनेवालोंका कर्ममें अनधिकार ही सिद्ध होगा । और यह बात माननीय नहीं है, क्योंकि कर्म तो अविद्वानोंको भी करते देखा जाता है और दक्षिणमार्गका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतिसे भी यही सिद्ध होता है । और यदि उनका अधिकार न होता तो श्रुतिमें एकमात्र उत्तरमार्गका ही प्रतिपादन किया होता, क्योंकि दक्षिण मार्ग केवल स्मार्त कर्मके ही कारण प्राप्त होनेवाला नहीं है, जैसा कि “यज्ञसे दानसे” इत्यादि श्रुतिसे भी सिद्ध होता है । तथा ‘मेरेद्वारा इस प्रकार कहे हुए’ इस वाक्यद्वारा विशेषरूपसे निरूपण किये जानेके कारण भी विद्वान्के सामने ही उसे कर्मका अधिकार नहीं है । अग्निहोत्र |