भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 137

खण्ड ११ ] शाङ्करभाष्यार्थे १३३


उषस्तिके प्रति प्रस्तोताका प्रश्न

अथ हैनँ प्रस्तोतोपससाद प्रस्तोतर्या देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रस्तोष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति मा भगवानवोचत्कतमा सा देवतेति ॥४॥

तदनन्तर उस (उषस्ति) के पास [शिष्यभावसे] प्रस्तोता आया [और बोला—] 'भगवन्! आपने जो मुझसे कहा था कि हे प्रस्तोतः! जो देवता प्रस्तावमें अनुगत है यदि तू उसे बिना जाने प्रस्तवन करेगा तो तेरा मस्तक गिर जायगा—सो वह देवता कौन है?' ॥४॥

अथ हैनमौषस्त्यं वचः श्रुत्वा प्रस्तोतोपससादोषस्तिं विनयेनोपजगाम। प्रस्तोतर्या देवतेत्यादि मा मां भगवानवोचत्पूर्वम्; कतमा सा देवता? या प्रस्तावभक्तिमन्वायत्तेति ॥४॥तदनन्तर उषस्तिका यह वचन सुनकर प्रस्तोता उषस्तिके प्रति उपसन्न हुआ—विनीत भावसे उषस्तिके समीप आया [और बोला—] 'श्रीमान्ने जो पहले 'हे प्रस्तोतः! जो देवता प्रस्तावमें अनुगत है' इत्यादि वाक्य मुझसे कहा था सो वह देवता कौन है, जो कि प्रस्ताव-भक्तिमें अनुगत है?' ॥४॥
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उषस्तिका उत्तर---प्रस्तावानुगत देवता प्राण है

प्राण इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि प्राणमेवाभिसंविशन्ति प्राणमभ्युज्जिहते। सैषा देवता प्रस्तावमन्वायत्ता। तां चेदविद्वान्प्रास्तोष्यो मूर्धा ते व्यपतिष्यत्तथोक्तस्य मयेति ॥ ५ ॥

उस (उषस्ति) ने 'वह (देवता) प्राण है' ऐसा कहा 'क्योंकि ये सभी भूत प्राणमें ही प्रवेश कर जाते हैं और प्राणसे ही उत्पन्न होते