छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 156, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| १५२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
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अथोताप्याहुः साम नो बतेति यत्साधु भवति साधु बतेत्येव तदाहुरसाम नो बतेति यदसाधु भवत्यसाधु बतेत्येव तदाहुः ॥ ३ ॥
इसके अनन्तर ऐसा भी कहते हैं कि 'हमारा साम (शुभ हुआ)। अर्थात् जब शुभ होता है तो 'अहा ! बड़ा अच्छा हुआ' ऐसा कहते हैं; और ऐसा भी कहते हैं—'हमारा असाम हुआ' अर्थात् जब अशुभ होता है तो 'ओह ! बुरा हुआ !' ऐसा कहते हैं ॥ ३ ॥
| अथोताप्याहुः स्वसंवेद्यं साम नोऽस्माकं बतेत्यनुकम्पयन्तः संवृत्तमित्याहुः । एतच्चैरुक्तं भवति यत् साधु भवति साधु बतेत्येव तदाहुः । विपर्यये जातेऽसाम नो बतेति । यदसाधु भवत्यसाधु बतेत्येव तदाहुः । तस्मात्सामसाधुशब्दयोरेकार्थत्वं सिद्धम् ॥ ३ ॥ | इसके अनन्तर ऐसा भी कहते हैं कि 'अहा ! वह स्वयं ही अनुभव करने योग्य साम हमें प्राप्त हो गया है।' 'बत' इस निपातका आशय यह है कि वे अनुकम्पा करते हुए कहते हैं। अर्थात् उनके द्वारा यह प्रतिपादित होता है कि जो साधु होता है वही 'अहा ! यह साधु है' ऐसा कहा जाता है तथा विपरीत होनेपर 'ओह ! हमारे लिये यह असाम है' ऐसा कहते हैं। जो असाधु होता है वही 'ओह ! यह असाधु (बुरा) है' ऐसा कहा जाता है। इससे साम और साधु शब्दोंकी एकार्थता सिद्ध होती है ॥ ३ ॥ |
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स य एतदेवं विद्वान्साधु सामेत्युपास्तेऽभ्याशो ह यदेनग्ँसाधवो धर्मा आ च गच्छेयुरुप च नमेयुः ॥४॥
इसे ऐसे जाननेवाला जो पुरुष 'साम साधु है' इस प्रकार उपासना करता है उसके पास, जो साधु धर्म हैं वे शीघ्र ही आ जाते हैं और उसके प्रति विनम्र हो जाते हैं ॥ ४ ॥