छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 260, कुल 978 में से
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| २५६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| तथामृतानाममृतानि वेदा ह्यमृताः नित्यत्वात्, तेषामेतानि रोहितादीनि रूपाण्यमृतानि । रसानां रसा इत्यादि कर्मस्तुतिरेषा—यस्यैवंविशिष्टान्यमृतानि फलमिति ॥ ४ ॥ | तथा ये अमृर्तोंके भी अमृत हैं, क्योंकि वेद ही नित्य होनेके कारण अमृत हैं, उनके भी ये रोहितादि रूप अमृत हैं । 'रसानां रसाः' (रसोंके रस) इत्यादि वाक्य कर्मकी स्तुति है; अर्थात् इस वाक्यका ऐसा तात्पर्य है कि जिस रसरूप कर्मके ऐसे अमृतरूप फल हैं [उसके माहात्म्यका कहाँतक वर्णन किया जाय ?] ॥ ४ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये पञ्चमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ५ ॥