छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 307, कुल 978 में से
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चतुर्दश खण्ड
शाण्डिल्यविद्या
सर्वदृष्टिसे ब्रह्मोपासना
| पुनस्तस्यैव त्रिपादमृतस्य ब्रह्मणोऽनन्तगुणवतोऽनन्तशक्तेरनेकभेदोपास्यस्य विशिष्टगुणशक्तिमत्त्वेनोपासनं विधित्सन्नाह— | अब फिर उसी त्रिपादमृत, अनन्तगुणवान्, अनन्तशक्ति और अनेक प्रकारसे उपासनीय ब्रह्मकी विशिष्टगुणयुक्त और शक्तिमान् रूपसे उपासनाका विधान करनेकी इच्छासे श्रुति कहती है— |
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सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत ।
अथ खलु क्रतुमयः पुरुषो यथाक्रतुरस्मँल्लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति स क्रतुं कुर्वीत ॥ १ ॥
यह सारा जगत् निश्चय ब्रह्म ही है, यह उसीसे उत्पन्न होनेवाला, उसीमें लीन होनेवाला और उसीमें चेष्टा करनेवाला है—इस प्रकार शान्त [रागद्वेषरहित] होकर उपासना करे, क्योंकि पुरुष निश्चय ही क्रतुमय—निश्चयात्मक है; इस लोकमें पुरुष जैसे निश्चयवाला होता है वैसा ही यहाँसे मरकर जानेपर होता है । अतः उस पुरुषको निश्चय करना चाहिये ॥१॥
| सर्वं समस्तं खल्विति वाक्यालङ्कारार्थो निपातः । इदं जगन्नामरूपविकृतं प्रत्यक्षादिविषयं ब्रह्म कारणं वृद्धतमत्वादूब्रह्म । | सर्व—समस्त 'खलु' यह निपात वाक्यकी शोभा बढ़ानेके लिये है । यह अर्थात् नाम-रूपमय विकारको प्राप्त होनेवाला और प्रत्यक्षादि प्रमाणोंका विषयभूत जगत् ब्रह्म—कारणरूप ही है । वृद्धतम [ सबसे बड़ा ] होनेके कारण वह [ जगत्-का कारण ] ब्रह्म कहलाता है । |
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