भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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खण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ २७


शाङ्करभाष्यम्शाङ्करभाष्यार्थ
न चोभयोर्मार्गयोरन्यतर-<br>स्मिन्नपि मार्ग आत्यन्तिकी<br>पुरुषार्थसिद्धिरित्यतः कर्मनिर-<br>पेक्षमद्वैतात्मविज्ञानं संसार-<br>गतित्रयहेतूपमर्देन वक्तव्यमित्यु-<br>पनिषदारभ्यते ।इन दोनों मार्गोंमेंसे किसी भी एक मार्गपर रहनेसे आत्यन्तिक पुरुषार्थकी सिद्धि नहीं हो सकती। अतः संसार-की [उपर्युक्त] त्रिविध गतियोंके हेतु-भूत कर्मका निराकरण करते हुए कर्मकी अपेक्षासे रहित अद्वैत-आत्म-ज्ञानका प्रतिपादन करना है; इसी उद्देश्यसे इस उपनिषद्का आरम्भ किया जाता है।
न चाद्वैतात्मविज्ञानादन्यत्रा-<br>ज्ञानस्यैव त्यान्तिकी निःश्रेय-<br>मोक्षसाधनत्वम् सम्प्राप्तिः । वक्ष्यति<br>हि—"अथ येऽन्यथातो विदुरन्य-<br>राजानस्ते क्षय्यलोका भवन्ति ।"<br>(छा० उ० ७ । २५ । २)<br>विपर्यये च "स स्वराड्भवति"<br>(छा० उ० ७।२५।२) इति ।अद्वैतात्मविज्ञानके बिना और किसी प्रकार आत्यन्तिक कल्याणकी प्राप्ति नहीं हो सकती। जैसा कि आगे कहेंगे भी—"जो लोग इस (अद्वैतात्मज्ञान) से विपरीत जानते हैं, वे अन्यराज (अनात्माके अधीन) होते और क्षीण होनेवाले लोकोंमें जाते हैं।" किंतु इससे विपरीत आत्म-ज्ञान होनेपर [श्रुति कहती है कि] "वह स्वराट् होता है।"
तथा द्वैतविषयानृताभिसंधस्य<br>बन्धनं तस्करस्येव तप्तपरशुग्रहणे<br>बन्धदाहभावः संसारदुःखप्राप्ति-<br>श्चेत्युक्त्वाद्वैतात्मसत्याभिसंध-इस प्रकार तपे हुए परशुको ग्रहण करनेसे चोरके जलने और बन्धनमें पड़नेके समान द्वैतविषय-रूप मिथ्यामें अभिनिवेश रखनेवाले पुरुषका बन्धन होता है तथा उसे सांसारिक दुःखोंकी प्राप्ति होती है—यह बतलाकर श्रुति