छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 356, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थ अध्याय
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प्रथम खण्ड
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राजा जानश्रुति और रैक्वका उपाख्यान
| वायुप्राणयोर्ब्रह्मणः पाददृष्ट्य-<br>ध्यासः पुरस्ताद्वर्णितः । अथे-<br>दानीं तयोः साक्षाद्ब्रह्मत्वेनोपा-<br>स्यत्वायोत्तरमारभ्यते। सुखाव-<br>बोधार्थारख्यायिका विद्यादान-<br>ग्रहणविधिप्रदर्शनार्था च ।<br>श्रद्धान्नदानानुद्धतत्वादीनां च<br>विद्याप्राप्तिसाधनत्वं प्रदर्श्यत<br>आख्यायिकया— | वायु और प्राणमें ब्रह्मकी पाद-<br>दृष्टिके अध्यासका वर्णन पहले<br>(तृतीय अध्यायमें) कर दिया गया।<br>अब इस समय उनका साक्षात्<br>ब्रह्मरूपसे उपास्यत्व बतलानेके<br>लिये आगेका प्रकरण आरम्भ किया<br>जाता है। यहाँ जो आख्यायिका है<br>वह सरलतासे समझनेके लिये तथा<br>विद्याके दान और ग्रहणकी विधि<br>प्रदर्शित करनेके लिये है। साथ ही<br>इस आख्यायिकाद्वारा श्रद्धा, अन्नदान<br>और अनुद्धतत्व (विनय) आदिका<br>विद्याप्राप्तिमें साधनत्व भी प्रदर्शित<br>किया जाता है— |
ॐ जानश्रुतिर्ह पौत्रायणः श्रद्धादेयो बहुदायी बहुपाक्य आस । स ह सर्वत आवसथान्मापयाञ्चक्रे सर्वत एव मेऽत्स्यन्तीति ॥ १ ॥
जनश्रुतकी संतान-परम्परामें उत्पन्न एवं उसके पुत्रका पौत्र श्रद्धापूर्वक देनेवाला एवं बहुत दान करनेवाला था और उसके यहाँ [दान करनेके लिये]