छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 387, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३८१
साहमेतन्न वेद यद्गोत्रस्त्वमसि जबाला तु नामाहमस्मि सत्यकामो नाम त्वमसीति सोऽहꣳसत्यकामो जाबालोऽस्मि भो इति ॥ ४ ॥
उससे [गौतमने] कहा—'हे सोम्य ! तू किस गोत्रवाला है ?' उसने कहा—'भगवन् ! मैं जिस गोत्रवाला हूँ उसे नहीं जानता । मैंने मातासे पूछा था । उसने मुझे यह उत्तर दिया कि 'पहले मैं पतिके घर आये हुए बहुतसे अतिथियोंकी सेवा-टहल करनेवाली परिचारिका थी [ परिचर्यामें संलग्न होनेसे ही गोत्र आदिकी ओर मेरा ध्यान नहीं रहा ] । उन्हीं दिनों युवावस्थामें जब मैंने तुझे प्राप्त किया [ तुम्हारे पिता परलोकवासी हो गये, अतः उनसे भी न पूछ सकी], इसलिये मैं यह नहीं जानती कि तू किस गोत्रवाला है ? मैं जबाला नामवाली हूँ और तू सत्यकाम नामवाला है ।' अतः हे गुरो ! मैं सत्यकाम जाबाल हूँ ॥ ४ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तं होवाच गौतमः—किंगोत्रो नु सोम्यासि ? इति, विज्ञातकुलगोत्रः शिष्य उपनेतव्यः, इति पृष्टः प्रत्याह सत्यकामः । स होवाच नाहमेतद्वेद भोः, यद्गोत्रोऽहमस्मि, किं त्वपृच्छं पृष्टवानस्मि, मातरम्; सा मया पृष्टा मां प्रत्यब्रवीन्माता—बह्वहं चरन्तीत्यादि पूर्ववत् । तस्या अहं वचः स्मरामि, सोऽहं सत्यकामो जाबालोऽस्मि भो इति ॥४॥ | उससे गौतमने कहा---'हे सोम्य ! तू किस गोत्रवाला है ? क्योंकि जिसके कुल और गोत्रका पता हो उसी शिष्यका उपनयन करना चाहिये ।' इस प्रकार पूछे जानेपर सत्यकामने उत्तर दिया । वह बोला—'भगवन् ! मैं जिस गोत्रवाला हूँ, उसे नहीं जानता किंतु मैंने मातासे पूछा था, मेरेद्वारा पूछे जानेपर माताने मुझे यही उत्तर दिया कि 'मैं बहुत-से अतिथियोंकी सेवा-टहल करनेवाली' इत्यादि पूर्ववत् समझना चाहिये । मुझे उसके वे वचन याद हैं; अतः हे गुरो ! मैं सत्यकाम जाबाल हूँ' ॥ ४ ॥ |