छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 395, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ६ ] शाङ्करभाष्यं ३९१
स य एतमेवं विद्वाँश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणोऽ- नन्तवानित्युपास्तेऽनन्तवानस्मिँल्लोके भवत्यनन्तवतो ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वाँश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणोऽनन्तवानित्युपास्ते ॥ ४ ॥
वह, जो इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्कल पादको 'अनन्तवान्' इस गुणसे युक्त उपासना करता है वह इस लोकमें अनन्तवान् होता है और अनन्तवान् लोकोंको जीत लेता है, जो कि इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्कल पादकी 'अनन्तवान्' इस गुणसे युक्त उपासना करता है ॥ ४ ॥
| स यः कश्चिद्यथोक्तं पादम- <br><br> नन्तवत्त्वेन गुणेनोपास्ते स <br><br> तथैव तद्गुणो भवत्यस्मिँल्लोके <br><br> मृतश्चानन्तवतो ह लोकान्स <br><br> जयति य एतमेवमित्यादि <br><br> पूर्ववत् ॥ ४ ॥ | वह, जो कोई पुरुष उपर्युक्त पाद-की अनन्तवत्त्वगुणसे युक्त उपासना करता है वह इस लोकमें उसी प्रकार—उसी गुणवाला हो जाता है, तथा मरनेपर अनन्तवान् लोकोंको जीत लेता है, जो कि इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष—इत्यादि शेष अर्थ पूर्ववत है ॥ ४ ॥ |
इति च्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये षष्ठखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ६ ॥