भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 47
खण्ड १ ]शाङ्करभाष्यार्थ४३
शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
तेनाक्षरेण प्रकृतेनेयमृग्वेदा-<br>दिलक्षणा त्रयीविद्या त्रयी-<br>विद्याविहितं कर्मेत्यर्थः । न हि<br>त्रयीविद्यैवांश्रावणादिभिर्वर्तते ।<br>कर्म तु तथा प्रवर्तत इति प्रसि-<br>द्धम्। कथम् ? ओमित्याश्रावयत्यो-<br>मिति शंसत्योमित्युद्गायतीति<br>लिङ्गाच्च सोमयाग इति गम्यते ।<br>तच्च कर्मैतस्यैवाक्षरस्यापचि-<br>त्यै पूजार्थम् । परमात्मप्रतीकं<br>हि तत् । तदपचितिः परमात्मन<br>एव सा । “स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य<br>सिद्धिं विन्दति मानवः” (गीता<br>१८ । ४६) इति स्मृतेः ।<br>किं चैतस्यैवाक्षरस्य महिम्ना<br>महत्त्वेन ऋत्विग्यजमानादि-उस प्रकृत अक्षरसे ही यह ऋग्वेदादिरूप त्रयीविद्या अर्थात् त्रयीविद्यासे विधान किया हुआ कर्म प्रवृत्त होता है, क्योंकि आश्रावण आदि कर्मोंद्वारा स्वयं त्रयीविद्या ही प्रवृत्त नहीं हुआ करती । हाँ, यह प्रसिद्ध ही है कि कर्म इस प्रकार प्रवृत्त हुआ करता है। किस प्रकार ? [ सो बतलाते हैं— ] ॐ ऐसा कहकर [अध्वर्यु ] आश्रावण करता है, ॐ ऐसा कहकर [होता] शंसन करता है और ॐ ऐसा कहकर [उद्गाता] उद्गान करता है । इस प्रकार आश्रावण आदि तीनों कर्मोंके समाहाररूप लिङ्ग* (लक्षण) से जाना जाता है कि यह सोमयागका वर्णन है।<br>तथा वह कर्म भी इस अक्षरकी ही अपचिति—पूजाके लिये है, क्योंकि वह परमात्माका प्रतीक है, अतः उसकी पूजा परमात्माकी ही पूजा है; जैसा कि “अपने कर्मसे उसका पूजन करके मनुष्य सिद्धि लाभ करता है” इस स्मृतिसे सिद्ध होता है ।<br>तथा इस अक्षरकी महिमा—महत्त्व, यानी ऋत्विज् एवं यजमान

* अध्वर्यु होता और उद्गाता—इन तीनोंके कर्मोंका समाहार दर्शपूर्णमास आदिमें सम्भव नहीं है । अग्निष्टोम आदि यज्ञोंमें ही जो सोमयागसंस्थाके अन्तर्गत हैं उसकी सम्भावना है । अतः यहाँ उक्त तीनों कार्योंके समाहाररूप लिंग ( लक्षण ) से यह सूचित होता है कि यहाँ ॐकारसे आरम्भ होनेवाले त्रयीविद्या-विहित कर्म-सोमयागका ही वर्णन है ।

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