छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 477, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४७३
| पित्रेत्यर्थः । इत्युक्तः स अङ्—<br>अनु हि अनुशिष्टोऽस्मि भगव<br>इति सूचयन्नाह ॥ १ ॥ | जानेपर उसने कहा—"हाँ,<br>भगवन् ! मैं अनुशासित किया गया<br>हूँ"—इस प्रकार सूचित करते हुए<br>उसने उत्तर दिया ॥ १ ॥ |
प्रवाहणके प्रश्न
| तं होवाच—यद्यनुशिष्टोऽसि, | उसने उससे कहा—'यदि तुझे शिक्षा दी गयी है तो— |
वेत्थ यदितोऽधि प्रजाः प्रयन्तीति ? न भगव इति । वेत्थ यथा पुनरावर्तन्त ३ इति ? न भगव इति । वेत्थ पथोर्देवयानस्य पितृयाणस्य च व्यावर्तना ३ इति ? न भगव इति ॥ २ ॥
'क्या तुझे मालूम है कि इस लोकसे [ जानेपर ] प्रजा कहाँ जाती है ?' [ श्वेतकेतु— ] 'भगवन् ! नहीं।' [ प्रवाहण— ] 'क्या तू जानता है कि वह फिर इस लोकमें कैसे आती है ?' [ श्वेतकेतु— ] 'नहीं, भगवन् !' [ प्रवाहण— ] 'देवयान और पितृयाण—इन दोनों मार्गोंका एक दूसरेसे विलग होनेका स्थान तुझे मालूम है ?' [ श्वेतकेतु— ] 'नहीं भगवन् !' ॥ २ ॥
| वेत्थ यदितोऽस्माल्लोकादधि ऊर्ध्वं यत्प्रजाः प्रयन्ति यद्गच्छन्ति, तत्किं जानीषे ? इत्यर्थः । न भगव इत्याहेतरः, न जानेऽहं तद्यत्पृच्छसि । एवं तर्हि, वेत्थ जानीषे यथा येन प्रकारेण पुनरावर्तन्त इति न भगव इति प्रत्याह । | 'क्या तू जानता है कि यहाँसे—इस लोकसे परे प्रजा कहाँ जाती है ? तात्पर्य यह है कि क्या तुझे इसका पता है ?' इसपर दूसरे (श्वेतकेतु) ने कहा—'भगवन् ! नहीं, आप जो कुछ पूछते हैं वह मैं नहीं जानता।' 'अच्छा तो; जिस तरह वह इस लोकमें आती है वह क्या तुझे मालूम है ?' इसपर उसने उत्तर दिया--'भगवन् ! नहीं।' क्या |